Una News: ऊना जिले के हरोली विधानसभा क्षेत्र के ऐतिहासिक गांव पंजावर में सहकारिता आंदोलन के गौरवशाली इतिहास को नई पहचान दी जा रही है। गांव में करीब 5 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त ‘मियां हीरा सिंह स्टेट कोऑपरेटिव ट्रेनिंग सेंटर एवं सामुदायिक केंद्र’ का निर्माण कार्य तेज गति से चल रहा है। इस भव्य भवन का लगभग 60 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है और आगामी छह महीनों के भीतर इसे पूरी तरह से जनता को समर्पित करने की योजना है।
यह आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र सहकारिता क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों, कर्मचारियों और संस्थाओं को प्रशिक्षण प्रदान करने के साथ-साथ विभिन्न सहकारिता गतिविधियों और सामुदायिक आयोजनों के लिए एक बेहतरीन आधारभूत ढांचा उपलब्ध करवाएगा। पंजावर गांव का भारतीय सहकारिता के इतिहास में एक विशेष और अनूठा स्थान रहा है, जिसे इस परियोजना के माध्यम से फिर से रेखांकित किया जा रहा है।
हरोली की विरासत को संरक्षित करने का प्रयास: मुकेश अग्निहोत्री
परियोजना पर जानकारी साझा करते हुए प्रदेश के उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि हरोली के चहुंमुखी विकास के साथ-साथ क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि पंजावर की सहकारिता क्रांति पूरे प्रदेश और देश के लिए प्रेरणा स्रोत है। इस केंद्र के तैयार होने से पंजावर को सहकारिता प्रशिक्षण के एक प्रमुख केंद्र के रूप में पूरे राज्य में नई और विशिष्ट पहचान मिलेगी।
134 वर्ष पुराने ऐतिहासिक सहकारिता आंदोलन को सम्मान
सहकारिता आंदोलन ऊना के पंजावर से आरंभ हुआ। मगर 1904 में तमिलनाडु में पहली सहकारी सोसायटी पंजीकृत हुई और वहां के लोगों का मानना है सहकारिता की शुरुआत यहां से ही हुई।
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित पंजावर गांव को भारत में सहकारिता की गंगोत्री माना जाता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1892 में पंजावर गांव के दूरदर्शी ग्रामीण मियां हीरा सिंह ने स्थानीय किसानों को संगठित कर सामूहिक विकास और सहयोग की ऐतिहासिक शुरुआत की थी। यद्यपि उस दौर में सहकारी संस्थाओं के लिए कोई औपचारिक कानून उपलब्ध नहीं था, जिसके कारण इस पहल को आधिकारिक पंजीकरण नहीं मिल सका था, फिर भी मियां हीरा सिंह की इस अनूठी सोच ने सहकारिता आंदोलन की मजबूत नींव रखी। अब लगभग 134 वर्ष बाद उनके इस ऐतिहासिक योगदान को चिरस्थायी बनाने के लिए इसी गांव में उनके नाम से प्रशिक्षण केंद्र बनाया जा रहा है।
कौन थे मियां हीरा सिंह
मियां हीरा सिंह का जन्म हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के हरोली विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पंजावर गांव में 1852 को हुआ। (तब ऊना पंजाब का हिस्सा था)। वे एक दूरदर्शी, संवेदनशील और समाज सुधारक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। मियां हीरा सिंह को भारत में सहकारिता आंदोलन का जनक या पितामह माना जाता है। उनकी सहकारिता के विचार के बारे में हावर्ड यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉन्सिन- मैडिसन एंड कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में पढ़ाया जाता है।
ब्रिटिश हुकूमत और साहूकारों के शोषण से तंग आकर रखी सहकारिता की नींव
19वीं सदी के अंत में जब पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत और साहूकारों के शोषण से जूझ रहा था, तब उन्होंने हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के पंजावर गांव से एक ऐसी अनूठी क्रांति की शुरुआत की जिसने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई। सन 1892 के उस दौर में पंजाब (जिसका हिस्सा तब यह क्षेत्र था) के किसान बार-बार आने वाली बाढ़, स्वां नदी द्वारा भूमि कटाव और साहूकारों के भारी कर्ज से पूरी तरह तबाह हो चुके थे। मियां हीरा सिंह ने महसूस किया कि व्यक्तिगत तौर पर इस समस्या से नहीं लड़ा जा सकता, इसलिए उन्होंने पारस्परिक सहायता और सामूहिक संगठन का रास्ता चुना।
उन्होंने वर्ष 1892 में स्थानीय किसानों को एकजुट करके एक ‘ग्राम सभा’ बनाई। यह ब्रिटिश सरकार द्वारा 1904 में लाए गए ‘सहकारी ऋण समिति अधिनियम’ से भी 12 साल पहले का प्रयास था। उनके नेतृत्व में ग्रामीणों ने स्वां नदी की बाढ़ से अपनी जमीनों को बचाने के लिए भू-संरक्षण का काम शुरू किया। इस सभा के तहत किसानों ने अपनी जमीनों को एकत्रित किया, जंगलों की रक्षा की, और सामूहिक रूप से खेती व सिंचाई का प्रबंधन किया। मियां हीरा सिंह के इसी दूरदर्शी और निस्वार्थ प्रयास की वजह से पंजावर गांव का नाम इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।