रमेश कंवर: केलांग
Lahaul Spiti News: जनजातीय जिला लाहुल के अधिष्ठाता देव राजा गेपांग (घेपन) तीन वर्षों के लंबे अंतराल के बाद अपनी प्रजा का हाल-चाल जानने और घाटी की परिक्रमा के लिए 20 अक्टूबर से भव्य रथ यात्रा पर निकलेंगे। इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा को लेकर संपूर्ण लाहुल घाटी में देव परंपराओं का उत्साह और भक्तिमय माहौल देखा जा रहा है। 2026 की इस रथ यात्रा का पहला पारंपरिक ‘जागरा’ ट्रीलिंग गांव में आयोजित किया जाएगा।
देव परंपरा के अनुसार, 19 अक्टूबर को राजा गेपांग की वास स्थली शाशेन में देवता के रथ को आकर्षक, रंग-बिरंगे और चटक वस्त्रों से भव्य रूप से सजाया जाएगा। इसके उपरांत 20 अक्टूबर को राजा गेपांग और देवी भोटी का पवित्र मिलन होगा।
क्यसंगदोर मेले में होगा देवी-देवताओं का महामिलन और भविष्यवाणियां
राजा गेपांग और रोपसंग की देवी भोटी के मिलन के पश्चात दोनों देवता चंद्रा घाटी के अन्य देवी-देवताओं के साथ महामिलन के लिए गुनचलिंग में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक ‘क्यसंगदोर’ मेले के लिए रवाना होंगे। इस महामिलन एवं परिक्रमा यात्रा में चंद्रा घाटी के प्रमुख देव कुटुंब शामिल होंगे, जिनमें शूलिंग के मोगर देवता, रालिंग के ड्राबला, खाले के लुंगखोरबल, ट्रीलिंग के शलबर, गोंदला के मेलंग तेते तथा सकर के थांगलाभर एवं नंगलाभर देवता अपने पूरे लाव-लश्कर और कुटुंब के साथ भाग लेंगे।
जानिए क्यसंगदोर मेले की धार्मिक मान्यता
क्यसंगदोर मेले की विशेष धार्मिक मान्यता है कि यहां खाले के लुंगखोरबल और गोंदला के मेलंग तेते को छोड़कर अन्य सभी 7 देवी-देवताओं के रथों को एक निश्चित और पवित्र स्थान पर लिटा दिया जाता है। इस दौरान देव गुर और पुजारी आने वाले वर्ष के लिए महत्वपूर्ण भविष्यवाणियां भी करेंगे। क्यसंगदोर के दौरान दो रातों तक किसी भी आम व्यक्ति के जाने अथवा दर्शन करने पर पूर्ण एवं सख्त पाबंदी रहती है।
चंद्रा घाटी के बाद पट्टन घाटी की ओर प्रस्थान करेंगे राजा घेपन
क्यसंगदोर की धार्मिक रस्मों और चंद्रा घाटी के प्रवास को पूरा करने के पश्चात राजा गेपांग (घेपन) तथा देवी भोटी गोंदला, थोरंग और दालंग होते हुए पट्टन घाटी के अध्ययन एवं परिक्रमा दौरे पर आगे बढ़ जाएंगे। वहीं, महामिलन के उपरांत चंद्रा घाटी के अन्य सभी देवी-देवता अपने-अपने मूल देवालयों में लौट जाएंगे। इस देव यात्रा को लेकर स्थानीय श्रद्धालुओं और प्रशासन द्वारा सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं, ताकि सदियों पुरानी लाहुली सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ किया जा सके।