रमेश कंवर
Inspirational Story: भारत के पूर्व राष्ट्रपति और ‘मिसाइल मैन’ के नाम से विख्यात डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन का एक ऐसा प्रेरक प्रसंग सामने आया है, जो सिखाता है कि कठिन चुनौतियां और समय की कमी इंसान की वास्तविक क्षमताओं को निखार देती हैं। मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष की पढ़ाई के दौरान कलाम को एक ऐसा अल्टीमेटम मिला था, जिसने उनके करियर और भविष्य की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।
उस समय कॉलेज में कम ऊंचाई पर हमला करने वाले लड़ाकू विमान (लो-लेवल अटैक एयरक्राफ्ट) का डिजाइन तैयार करने का एक बेहद महत्वपूर्ण और जटिल प्रोजेक्ट आया था। इस बड़े कार्य को समय पर पूरा करने के लिए कलाम और उनके चार-पांच सहपाठियों की एक विशेष टीम गठित की गई थी, जिसमें सभी विद्यार्थियों के बीच कार्य का औपचारिक विभाजन किया गया था।
डिजाइन टीचर प्रोफेसर श्रीनिवासन ने काम को बताया अत्यंत निराशाजनक
प्रोजेक्ट का काम अपनी सामान्य गति से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। इसी बीच एक दिन विद्यार्थियों के डिजाइन शिक्षक और एमआईटी के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर के. श्रीनिवासन अचानक प्रगति का जायजा लेने लैब पहुंचे। उन्होंने प्रोजेक्ट शीट और रेखाचित्रों को बारीकी से देखा और साफ शब्दों में कह दिया कि काम की प्रगति बेहद निराशाजनक है।
प्रोफेसर ने नहीं सुना कोई बहाना, कलाम ने मांगी एक महीने की मोहलत
जब प्रोफेसर ने कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त किया, तो कलाम ने स्थिति को संभालते हुए कई कारण और बहाने सामने रखे। हालांकि, प्रोफेसर श्रीनिवासन ने उनकी किसी भी दलील को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद कलाम ने बेहद विनम्रता से निवेदन किया कि उन्हें प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए कम से कम एक महीने का अतिरिक्त समय और दिया जाए।
शुक्रवार दोपहर का वो अल्टीमेटम: 3 दिन में काम नहीं हुआ तो रुकेगी स्कॉलरशिप
प्रोफेसर श्रीनिवासन ने कलाम की आंखों में एकटक देखा और बेहद सख्त लहजे में कहा कि आज शुक्रवार की दोपहर है और वे केवल तीन दिन का समय दे रहे हैं। उन्होंने दो टूक चेतावनी दी कि यदि सोमवार सुबह तक एयरक्राफ्ट का पूरा कॉन्फिगरेशन डिजाइन उनके टेबल पर नहीं पहुंचा, तो कलाम की स्कॉलरशिप तत्काल प्रभाव से बंद कर दी जाएगी।
गरीब परिवार के कलाम के लिए स्कॉलरशिप थी पढ़ाई की एकमात्र जीवनरेखा
यह सख्त चेतावनी सुनते ही कलाम पूरी तरह सन्न रह गए। एक बेहद साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले कलाम के लिए वह स्कॉलरशिप केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि उनकी उच्च शिक्षा जारी रखने की एकमात्र जीवनरेखा थी। यदि स्कॉलरशिप छिन जाती, तो उनके पास इंजीनियरिंग की पढ़ाई आगे जारी रखने का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।
रात-दिन एक कर जुटे छात्र, न सोने की सुध रही और न खाने की परवाह
भविष्य पर मंडराते संकट को देखते हुए कलाम और उनके साथी उसी शुक्रवार की शाम से पूरी एकाग्रता के साथ काम में जुट गए। पूरी रात किसी ने पलक तक नहीं झपकाई और भोजन की सुध भी बिसरा दी। शनिवार को पूरी टीम ने केवल एक घंटे का संक्षिप्त विराम लिया, जिसमें केवल स्नान और हल्का भोजन किया गया, ताकि काम का एक भी पल व्यर्थ न जाए।
रविवार सुबह जब थकी आंखों और कांपते हाथों से तैयार हुआ पूरा डिजाइन
लगातार 48 घंटे से अधिक समय तक बिना रुके रेखाचित्र खींचते और गणनाएं करते हुए रविवार की सुबह तक टीम ने पूरा डिजाइन लगभग तैयार कर लिया। काम करते-करते सभी साथी शारीरिक रूप से बेहद थक चुके थे, नींद न आने से आंखें लाल थीं, लेकिन हाथों की रफ्तार और संकल्प में कोई कमी नहीं आई थी।
टेनिस खेलकर लैब पहुंचे प्रोफेसर ने काम देख कलाम को लगाया गले
उसी रविवार सुबह प्रोफेसर श्रीनिवासन टेनिस खेलकर सीधे लैब पहुंच गए। उन्होंने तैयार किए गए डिजाइन के एक-एक हिस्से का तकनीकी विश्लेषण किया और बेहद बारीकी से जांच की। बेहतरीन काम देखकर उनका चेहरा खिल उठा, उन्होंने तुरंत कलाम को गले लगा लिया और पीठ थपथपाते हुए कहा कि वे जानते थे कि उन्होंने असंभव डेडलाइन दी थी, लेकिन कलाम ने उम्मीद से बेहतर काम करके दिखाया।
घर ले जाकर पिलाई मद्रास कॉफी, दिया जीवन का सबसे बड़ा मंत्र
प्रोफेसर श्रीनिवासन कलाम को अपने घर ले गए, जहां उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें मद्रास की प्रसिद्ध कॉफी पिलाई। बातचीत के दौरान प्रोफेसर ने कलाम को जीवन का सबसे बड़ा सबक देते हुए समझाया कि तनाव और दबाव के बिना कभी वास्तविक प्रगति नहीं होती, और जब अस्तित्व या कुछ बड़ा दांव पर लगा होता है, तो इंसान की आंतरिक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
मिसाइल प्रोग्राम और इसरो में आजीवन काम आई प्रोफेसर की वो सीख
यह ऐतिहासिक घटना कलाम के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुई। उन्होंने सीख लिया कि समय सीमा जितनी कठिन होगी, संकल्प उतना ही मजबूत होना चाहिए। आगे चलकर जब कलाम ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और भारत के स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम का नेतृत्व किया, तो यही दृढ़ता और अनुशासन उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।