रमेश कंवर: शिमला
Himachal News: भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) से जुड़े एरियर और वित्तीय अधिकारों के बहुप्रतीक्षित मामले में हिमाचल प्रदेश को सर्वोच्च न्यायालय से बड़ी ऐतिहासिक सफलता मिली है। इस न्यायिक व्यवस्था के तहत हिमाचल प्रदेश को अगले 20 वर्षों तक प्रतिवर्ष 60 करोड़ यूनिट अतिरिक्त बिजली मिलेगी, जिससे प्रदेश को आगामी दो दशकों के दौरान लगभग 10,000 करोड़ रुपये से लेकर 20,000 करोड़ रुपये तक की भारी आय प्राप्त होने का अनुमान है।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस फैसले पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे प्रदेश की जनता और राज्य के अधिकारों की लड़ाई की ऐतिहासिक जीत करार दिया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, ईमानदार प्रयासों और सर्वोच्च न्यायालय में निरंतर प्रभावी कानूनी पैरवी के कारण हिमाचल को उसका जायज हक मिला है।
उन्होंने वित्तीय परिदृश्य स्पष्ट करते हुए बताया कि यदि बिजली की दर 13 से 14 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित होती है, तो प्रदेश को प्रतिवर्ष लगभग 1,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आमदनी होगी। वहीं, यदि न्यूनतम दर 6 रुपये प्रति यूनिट भी रहती है, तब भी राज्य के खजाने में हर साल कम से कम 500 करोड़ रुपये का राजस्व जुड़ना तय है। यह राशि राज्य की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करने में मील का पत्थर साबित होगी।
प्रदेश के हितों की लड़ाई में वर्तमान सरकार की चौथी बड़ी न्यायिक जीत
वर्तमान सरकार के कार्यकाल में राज्य के वित्तीय और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े मामलों में यह चौथी बड़ी जीत है। इससे पहले राज्य सरकार ने वाइल्डफ्लावर हॉल, जेएसडब्ल्यू (JSW) और किशाऊ बांध से जुड़े पेचीदा कानूनी मामलों में हिमाचल के हितों की सशक्त पैरवी कर जीत दर्ज की थी।
शानन पावर प्रोजेक्ट और वाटर सेस पर भी मजबूती से जारी रहेगी कानूनी लड़ाई
सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि प्रदेश के जायज हक की लड़ाई यहीं नहीं रुकेगी। पंजाब पुनर्गठन और 99 वर्षीय लीज समाप्त होने के बाद शानन हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट की हिमाचल को वापसी तथा पनबिजली परियोजनाओं पर वाटर सेस (जल उपकर) लागू करने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी सरकार पूरी मजबूती से कानूनी लड़ाई लड़ रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की 75 लाख जनता और 24 लाख परिवारों ने उन्हें संसाधनों का संरक्षक बनाया है और वे इस दायित्व को पूरी निष्ठा के साथ निभाएंगे।
धूमल सरकार में मिली थी जीत
बीबीएमबी की तरफ से संचालित की जा रही बिजली परियोजनाओं में प्रेम कुमार धूमल की सरकार के समय वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट से हिमाचल के हक में फैसला आया था। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायमूर्ति एके पटनायक व न्यायमूर्ति आरवी रविंद्रन ने हिमाचल के हक में निर्णय सुनाते हुए बीबीएमबी परियोजनाओं में हिमाचल की 7.19 फीसदी हिस्सेदारी देने को कहा था। पंजाब व हरियाणा टालमटोल करते रहे।
सुक्खू सरकार ने निर्णायक मोड़ तक पहुंचाई एरियर की जंग
वर्तमान में सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने इस मामले में सक्रियता से काम करते हुए विभिन्न मंचों पर अपनी आवाज उठाई। सीएम सुक्खू ने इस मामले में पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखे और केंद्रीय उर्जा मंत्री एमएल खट्टर के साथ भी कई मर्तबा हिमाचल के हक की आवाज उठाई। अब छह नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का पूरी तरह से निपटारा कर दिया है।
अब कैश से नहीं बल्कि ऐसे होगा भुगतान
सुप्रीम कोर्ट ने बीबीएमबी परियोजनाओं के एरियर को लेकर हिमाचल को नकद रहित भुगतान यानी कैश की बजाय एरियर का भुगतान बिजली के रूप में देने के आदेश जारी किए। पंजाब व हरियाणा को ये बिजली बीस साल में देनी होगी। ये बिजली करीब 55 करोड़ मिलियन यूनिट बनती है।
भाखड़ा बांध और बीबीएमबी परियोजनाएं
भाखड़ा बांध को आधुनिक भारत में विकास का आरंभिक बड़ा कदम माना जाता है। भाखड़ा बांध बन जाने के बाद देश में इससे जुड़ी कुछ बिजली परियोजनाएं शुरू हुई। उन परियोजनाओं का प्रबंधन बीबीएमबी यानी भाखड़ा-ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड के पास आया। बीबीएमबी सतलुज व ब्यास नदी पर बनी विद्युत परियोजनाओं का संचालन और प्रबंधन करती है। उल्लेखनीय है कि पहले हिमाचल प्रदेश पंजाब का ही हिस्सा था, जब देश में भाखड़ा बांध प्रोजेक्ट तैयार हो रहा था तो इसके निर्माण में हिमाचल की काफी जमीन चली गई. वहां रहने वाले लोग विस्थापित हो गए
देश रोशन हुआ, लेकिन हिमाचल अंधेरे में रहा
भाखड़ा बांध बनने से भारत देश के अनेक हिस्से बिजली से रोशन हुए, लेकिन हिमाचल के लिए लंबे समय तक हक का समय अंधेरे वाला ही रहा। पंजाब पुनर्गठन एक्ट-1966 के तहत हिमाचल को बीबीएमबी परियोजनाओं से 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलनी तय की गई थी। हिमाचल ने इस हिस्से के हक को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। फिर 27 सितंबर 2011 को हिमाचल में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के समय सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल को परियोजना से 7.19 फीसदी हिस्सेदार का वैधानिक हकदार बताने वाला फैसला दिया।
जानिए कितना होना था भुगतान
वैधानिक रूप से हिमाचल को बीबीएमबी के तहत भाखड़ा बांध परियोजना से 2724 करोड़ रुपए, ब्यास-सतलुज लिंक यानी बीएसएल डैहर सुंदरनगर जिला मंडी प्रोजेक्ट से 1034.54 करोड़ रुपए व पौंग बांध प्रोजेक्ट से 491.89 करोड़ की हिस्सेदारी मिलनी तय हुई। पंजाब सरकार इसे लेकर उदासीन रही, जब कानूनी दबाव बढ़ा तो पंजाब सरकार ने पहले ये प्रस्ताव किया था कि बीबीएमबी परियोजनाओं से हिमाचल पंजाब को मिलने वाली बिजली से कुछ बिजली बेचे और दस साल में अपना बकाया पूरा कर ले।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी टालता रहा पंजाब
हिमाचल इस पर सहमत होने की तैयारी कर रहा था कि फिर पंजाब ने ये समय सीमा दस वर्ष की जगह बीस साल करने को कहा। पूर्व में जयराम ठाकुर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने तो एक समय इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल करने की तैयारी भी कर ली थी। बाद में बात आई गई हो गई और फिर हिमाचल में 2022 में कांग्रेस सत्ता में आ गई। सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस मामले में खूब प्रयास किए और इस तरह अब हिमाचल को पंद्रह साल बाद हक मिला है।
7000 परिवारों ने झेला था विस्थापन का दंश
भाखड़ा बांध परियोजना के लिए हिमाचल की जनता ने बहुत त्याग किया। कुल 35 हजार से अधिक लोग विस्थापित हुए थे। हिमाचल के करीब 7000 परिवारों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए 370 के करीब गांव उजड़े।
हिमाचल ने 1998 में खटखटाया था सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
यदि कानूनी लड़ाई की बात करें तो हिमाचल सरकार ने अपने हक के लिए सबसे पहले वर्ष 1998 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जब वर्ष 2011 में 13 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से हिमाचल के हक में फैसला आया था तो भाखड़ा परियोजना में हिमाचल की तब एक जनवरी 1966 से अक्टूबर 2011 तक की हिस्सेदारी की रकम बकाया थी। इसके अलावा ब्यास-सतलुज लिंक प्रोजेक्ट (बीएसएल) में 1977 से अक्टूबर 2011 की समय अवधि की हिस्सेदारी लंबित थी। वहीं, पौंग डैम में वर्ष 1978 से अक्टूबर 2011 तक की हिस्सेदारी के एवज में पंजाब व हरियाणा को हिमाचल की बकाया हिस्सेदारी का भुगतान करना था। ये तीन परियोजनाएं हैं और इनसे हिमाचल को बकाया के एवज में 13,066 मिलियन यूनिट बिजली मिलनी थी।
15 साल बाद मिला हिमाचल को सुप्रीम हक
पंजाब व हरियाणा ने अक्टूबर 2011 से आगे के लिए हिमाचल को हिस्सेदारी देना आरंभ किया, लेकिन एरियर पर टालमटोल ही करते आए थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 15 साल बीत चुके थे, लेकिन अब 2026 में हिमाचल को हक मिल ही गया। बीबीएमबी के तीन मुख्य प्रोजेक्ट भाखड़ा 1325 मेगावाट, पौंग बांध प्रोजेक्ट 396 मेगावाट व ब्यास सतलुज लिंक यानी बीएसएल प्रोजेक्ट सुंदरनगर 990 मेगावाट क्षमता का है। इन परियोजनाओं में हिस्सेदारी के एरियर की रकम का पंजाब को 60 फीसदी व हरियाणा को 40 फीसदी भुगतान करना था। वैसे तो ये रकम 4200 करोड़ रुपए से अधिक बनती है, लेकिन धन का भुगतान करने की बजाय पंजाब व हरियाणा बिजली देने पर राजी हुए। करीब 1300 करोड़ यूनिट बिजली की कीमत 6500 करोड़ रुपए (अनुमानित) बनती है।
केंद्रीय उर्जा मंत्री खट्टर की बड़ी भूमिका
मामले को सिरे चढ़ाने के लिए केंद्रीय उर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर की अहम भूमिका रही है। केंद्र में मंत्री बनने से पहले खट्टर हरियाणा के सीएम थे। हिमाचल में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने उस समय हरियाणा की सरकार संभाल रहे एमएल खट्टर से अपने हक को लेकर कई मर्तबा बात की। केंद्रीय उर्जा मंत्री खट्टर की पहल पर ही केंद्र सरकार के अटार्नी जनरल सहित पंजाब, हरियाणा व हिमाचल सरकारों ने मिलकर आम सहमति बनाने की दिशा में काम किया। एमएल खट्टर ने पूर्व में अपने शिमला दौरे में भी कहा था कि केंद्र सरकार बीबीएमबी परियोजनाओं के एरियर मामले में निष्पक्ष रहेगी। बाद में बीबीएमबी एरियर का मामला नकद भुगतान की बजाय बिजली आपूर्ति के रूप में तय हुआ। इसी फार्मूले को अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में रखा था।