रमेश कंवर: कुल्लू
International Kullu Dussehra 2026: देवभूमि कुल्लू एक बार फिर आस्था, समृद्ध परंपरा और देव संस्कृति के ऐतिहासिक महासंगम की साक्षी बनने जा रही है। बुधवार को ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का भव्य आगाज होगा। भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा के साथ इस सात दिवसीय देव महाकुंभ की विधिवत शुरुआत होगी। इस दौरान जिले भर के 300 से अधिक देवी-देवता अपने पारंपरिक लाव-लश्कर के साथ ढालपुर पहुंचकर भगवान रघुनाथ के दरबार में अपनी हाजिरी भरेंगे।
पहाड़ों की दुर्गम चोटियों, दूरदराज के गांवों और कठिन रास्तों से होते हुए देवी-देवताओं का ढालपुर मैदान में आगमन शुरू हो चुका है। इस वर्ष उत्सव के लिए 347 देवी-देवताओं को आधिकारिक तौर पर आमंत्रित किया गया है, जिनमें से लगभग 200 देवी-देवता ढालपुर पहुंच चुके हैं। शेष देवी-देवता रथयात्रा शुरू होने से पहले अपने निर्धारित स्थानों पर विराजमान हो जाएंगे। अगले सात दिनों तक समूची घाटी देव ध्वनियों, ढोल-नगाड़ों और करनाल की गूंज से भक्तिमय रहेगी।
International Kullu Dussehra 2026: रावण दहन नहीं, देव मिलन और रथयात्रा है उत्सव की पहचान
कुल्लू दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जहां पूरे देश में विजयदशमी के दिन रावण दहन के साथ दशहरा उत्सव संपन्न हो जाता है, वहीं कुल्लू में इसी दिन से इस ऐतिहासिक महापर्व का शुभारंभ होता है। यहां रामलीला या रावण दहन की जगह भगवान रघुनाथ की पवित्र रथयात्रा, देवी-देवताओं का आपसी मिलन और सदियों पुरानी देव परंपराएं उत्सव का मुख्य केंद्र होती हैं। यही अनूठी धार्मिक विशेषता कुल्लू दशहरा को देश और दुनिया के अन्य सभी दशहरा आयोजनों से बिल्कुल अलग बनाती है।
राज्यपाल करेंगे उत्सव का शुभारंभ, समापन पर मुख्यमंत्री होंगे मुख्य अतिथि
दशहरा उत्सव का शुभारंभ भगवान रघुनाथ जी की भव्य शोभायात्रा और रथ खींचने की पारंपरिक रस्म के साथ होगा। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल इस ऐतिहासिक रथयात्रा के साक्षी बनेंगे और सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय उत्सव का विधिवत शुभारंभ करेंगे। वहीं, 26 अक्तूबर को आयोजित होने वाले समापन समारोह में प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करेंगे।
देव शिविरों में पुख्ता व्यवस्थाएं, कारदार संघ ने दी तैयारियों की जानकारी
जिला कुल्लू देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने बताया कि दशहरा उत्सव समिति की ओर से सभी आमंत्रित देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजे गए हैं। विभिन्न घाटियों से देवताओं के पहुंचने का सिलसिला तेजी से जारी है और सभी देव शिविरों में आवश्यक प्रबंध पूरे कर लिए गए हैं। सात दिनों तक ढालपुर में आस्था, संस्कृति और लोक परंपराओं का ऐसा संगम देखने को मिलेगा जो कुल्लू की देव संस्कृति को विश्व पटल पर अलग पहचान दिलाता है।
17वीं शताब्दी के पश्चाताप और भक्ति से जुड़ा है कुल्लू दशहरा का इतिहास
कुल्लू दशहरा की ऐतिहासिक परंपरा 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, ब्राह्मण दुर्गादत्त की मृत्यु से जुड़े एक घटनाक्रम के बाद राजा गंभीर बीमारी और गहरे पश्चाताप से घिर गए थे। इसके बाद झीड़ी के पयोहारी बाबा किशन दास की सलाह पर अयोध्या से विशेष रूप से भगवान रघुनाथ जी की पावन प्रतिमा कुल्लू लाई गई थी।
राजपाट रघुनाथ जी को सौंपकर सेवक बने थे राजा, अब सात दिन मिलेंगे देव दर्शन
भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण दर्शाते हुए राजा जगत सिंह ने अपना सारा राजपाट भगवान रघुनाथ जी को अर्पित कर दिया और स्वयं उनके प्रथम सेवक बनकर रहने का संकल्प लिया। इसी अनूठी देव परंपरा ने आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा को जन्म दिया और इसे विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया। अब अगले सात दिनों तक देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को ढालपुर में अपने आराध्य देवी-देवताओं के एक साथ दर्शन करने का पावन अवसर मिलेगा।