Kullu Dussehra: जब पूरे देश में उत्सव थमता है, तब देवभूमि में जागता है 375 साल पुराना देवलोक

रमेश कंवर: कुल्लू 

Kullu Dussehra: भारत भर में जब विजयादशमी की शाम रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले जलकर राख हो जाते हैं और त्योहार का समापन मान लिया जाता है, ठीक उसी प्रहर हिमाचल प्रदेश के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा का अलौकिक आगाज होता है। स्थानीय बोली में ‘विदा दसमीं’ या ‘दशमी’ कहे जाने वाले इस महापर्व में न तो पारंपरिक रामलीला का मंचन होता है और न ही आतिशबाजी व पुतले जलाए जाते हैं। यह उत्सव समूची घाटी में सात दिनों तक चलने वाले जीवंत देव-मानस मिलन, प्राचीन परंपराओं और भगवान रघुनाथ के प्रति अटूट जनआस्था का सबसे बड़ा केंद्र है।

पौराणिक साहित्य, रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण, मार्कंडेय पुराण और कल्हण की राजतरंगिणी में इस पावन धरा को ‘कुलूत देश’ के नाम से पुकारा गया है। वेदों में गंधर्वों, किन्नरों, नागों और देव जातियों की तपोस्थली के रूप में वर्णित इस घाटी में महाप्रलय के बाद मानव जाति के आदिपुरुष मनु ऋषि ने अपने निवास की स्थापना की थी, जिसे आज मनाली (मनु-आलय) के नाम से जाना जाता है।

 

Kullu Dussehra: राजा की एक गलतफहमी और निर्दोष ब्राह्मण के आत्मदाह का वो खौफनाक मंजर

सत्रहवीं शताब्दी में वर्ष 1637 से 1662 के दौरान कुल्लू रियासत पर राजा जगत सिंह का शासन था, जिनकी प्रारंभिक राजधानी नग्गर और बाद में सुल्तानपुर बनी। वर्ष 1637 के आसपास मणिकर्ण घाटी के टिपरी गांव में दुर्गादत्त नाम का एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। किसी द्वेषी व्यक्ति ने राजा के कान भर दिए कि उस गरीब ब्राह्मण के पास सवा सेर (एक पाथा) सच्चे मोती छिपे हैं। राजा ने बिना सच्चाई जाने अपने सैनिकों को भेजकर ब्राह्मण से वे मोती छीनने का कठोर फरमान जारी कर दिया।

 

दुर्गादत्त का आत्मदाह और राजा को लगा ब्रह्महत्या का पाप

ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास ज्ञान और ईश्वर भक्ति के सिवा कोई मोती नहीं थे, लेकिन सैनिकों के अत्याचार और अपमान से आहत होकर उसने परिवार समेत घर को आग लगा दी। ब्राह्मण ने स्वयं बाहर खड़े होकर अपने शरीर का मांस काटकर धधकती ज्वाला में फेंकते हुए चीत्कार लगाई, ‘ले राजा, तेरे मोती!’ इस भीषण आत्मदाह से राजा जगत सिंह को ब्रह्महत्या का महापाप लगा और वे असाध्य कुष्ठ रोग से घिर गए। स्थिति इतनी विकराल हो गई कि राजा जब भी भोजन करने बैठते तो अन्न में कीड़े रेंगते दिखते और जल छूते ही वह रक्त में बदल जाता।

 

पयोहारी बाबा की सलाह, और अयोध्या से मूर्तियां लाने की दिव्य योजना

शारीरिक और मानसिक संताप से टूट चुके राजा जगत सिंहन ने झीड़ी के सिद्ध संत पयोहारी बाबा किशन दास की शरण ली। बाबा ने राजा को इस महापाप से मुक्ति का एक ही दिव्य मार्ग बताया कि अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान राम और माता सीता की दुर्लभ मूर्तियां लाकर कुल्लू में स्थापित की जाएं और राजपाट भगवान को सौंप दिया जाए। मान्यता है कि ये वही पावन मूर्तियां थीं जिन्हें त्रेता युग में प्रभु श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ के समय स्वयं गढ़ा था। इस अत्यंत कठिन और गोपनीय कार्य के लिए बाबा के अनन्य शिष्य दामोदर दास को अयोध्या भेजा गया।

 

पंडित दामोदर दास का अयोध्या में सेवादार बनना और मूर्तियों का अलौकिक चमत्कार

दामोदर दास ने अयोध्या पहुंचकर लगभग एक वर्ष तक मंदिर में सेवादार बनकर पूजा-अर्चना के सभी गुप्त विधान और रीतियां सीखीं। उचित अवसर मिलते ही वे मूर्तियों को लेकर कुल्लू की ओर चल पड़े। हरिद्वार के समीप अयोध्या के पुजारियों ने उन्हें घेर लिया और मूर्तियां छीनने का प्रयास किया, परंतु तभी एक चकित कर देने वाला चमत्कार हुआ। अयोध्या के पुजारी जब मूर्तियों को वापस ले जाने लगे तो वे पर्वत जैसी भारी हो गईं और अनेक लोग मिलकर भी उन्हें डिगा न सके, जबकि दामोदर दास के स्पर्श करते ही वे फूल समान हल्की हो गईं। इसे साक्षात प्रभु की लीला मानकर अयोध्या के पुजारियों ने मूर्तियों को कुल्लू ले जाने की आज्ञा दे दी।

 

मकड़ाह से मणिकर्ण होते हुए सुल्तानपुर में भगवान रघुनाथ का भव्य प्रतिष्ठापन

दामोदर दास वर्ष 1651 में प्रतिमाओं को लेकर पहले मकड़ाह पहुंचे और सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें कुछ समय मणिकर्ण, हरिपुर, वशिष्ठ व ग्राहण गांव में गुप्त रूप से रखा गया। वर्ष 1653 में मूर्तियां मणिकर्ण मंदिर में पूजी गईं और अंततः 1660 ईस्वी में माघ मास की पंचमी को राजा जगत सिंह ने सुल्तानपुर के रघुनाथ मंदिर में पूर्ण वैदिक विधान से प्रभु को प्रतिष्ठित किया। भगवान रघुनाथ के चरणामृत का पान करते ही राजा का कुष्ठ रोग चमत्कारिक रूप से तिरोहित हो गया और वे ब्रह्महत्या के श्राप से सर्वथा मुक्त हो गए।

 

राजपाट का पूर्ण समर्पण और राजा का चांदी की छड़ी थामकर सेवक बनना

रोगमुक्त होने पर राजा जगत सिंह ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए अपना समूचा राज्य, खजाना और सत्ता भगवान रघुनाथ के श्रीचरणों में समर्पित कर दी और स्वयं चांदी की छड़ी लेकर उनके ‘मुख्य छड़ीबरदार’ बन गए। राजा ने अपनी रियासत के सभी 365 ग्राम्य देवी-देवताओं को ढालपुर मैदान में रघुनाथ जी के सम्मान में महायज्ञ के लिए आमंत्रित किया। सभी देवी-देवताओं ने भगवान श्री रघुनाथ जी को अपना सर्वोच्च ईष्ट स्वीकार किया और वर्ष 1660-1661 से ‘कटागली शाड़’ (ढालपुर) में इस ऐतिहासिक देव समागम की परंपरा विधिवत शुरू हुई।

 

रामायण से जुड़ा गूढ़ रहस्य: सात दिन तक क्यों खिंचता है कुल्लू का यह देवपर्व

रघुनाथ मंदिर के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह के अनुसार, सात दिवसीय उत्सव का रहस्य रामायण के प्रसंग में छिपा है। मान्यता है कि विजयदशमी के दिन प्रभु श्रीराम ने रावण की नाभि में बाण मारकर विजय पाई थी, परंतु रावण की वास्तविक मृत्यु उस दिन नहीं हुई थी। रावण महाज्ञानी और वेदों का ज्ञाता था, इसलिए मृत्यु शय्या पर पड़े रावण से अंतिम 7 दिनों में श्रीराम के आदेश पर लक्ष्मण ने राजनीति और धर्म की गूढ़ शिक्षा ली थी। इसी उपलक्ष्य में कुल्लू में सात दिनों का उत्सव निरंतर चलता है।

 

राजनीति और धर्म की मर्यादा

श्रीराम के आदेश पर जब लक्ष्मण रावण के पास गए तो वे सिरहाने खड़े हुए। रावण शांत रहा, परंतु चरणों के पास बैठने पर उसने जीवन और राजकाज के अमूल्य सिद्धांत सिखाए। इन्हीं सात दिनों के आध्यात्मिक संवाद और ज्ञान के आदान-प्रदान की स्मृति को जीवित रखने के लिए कुल्लू में दशहरा सात दिनों तक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

 

मनाली की कुलदेवी माता हिडिंबा के कदम पड़ते ही गूंजता है उत्सव का शंखनाद

कुल्लू दशहरे का संबंध महाभारत काल से भी अत्यंत गहरा है। मनाली के विशाल देवदार वनों के मध्य स्थित चार छतों वाले पैगोड़ा शैली के मंदिर में विराजमान माता हिडिंबा कुल्लू राजघराने की कुलदेवी और ‘दादी’ मानी जाती हैं, जिनका मंदिर 1553 में राजा बहादुर सिंह ने बनवाया था। दशहरे के पहले दिन माता हिडिंबा की भव्य पालकी कुल्लू पहुंचती है, जहां रामशिला में राजपरिवार चांदी की छड़ी के साथ उनकी राजसी अगवानी करता है। जब तक कुलदेवी का रथ राजमहल में प्रवेश नहीं करता और उनकी पूजा नहीं होती, तब तक दशहरे की कोई भी प्रक्रिया आरंभ नहीं हो सकती।

 

हिडिंबा के आशीर्वाद से शुरू होती है देव प्रक्रिया

रामशिला से माता हिडिंबा देवरथ पूरे सम्मान के साथ राजा के बेहड़े (राजमहल) तक लाया जाता है। राजपरिवार के सभी सदस्य पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए माता के दर्शन करते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद लेते हैं। इसके बाद ही माता ढालपुर मैदान में प्रवेश करती हैं और उनके आदेश से ही देव समागम की मुख्य रस्में शुरू होती हैं।

 

भेखली पहाड़ी से माता भुवनेश्वरी का हरा झंडा और रथ खींचने की दैवीय अनुमति

ढालपुर मैदान में भगवान रघुनाथ के विशाल काष्ठ रथ को खींचने से पूर्व एक और अनिवार्य मर्यादा निभाई जाती है। ढालपुर के सामने पहाड़ी पर स्थित भेखली गांव के मंदिर से जब तक भेखली माता (भुवनेश्वरी माता) के हरा ध्वज फहराकर दिव्य संकेत नहीं मिलता, तब तक रथ आगे नहीं बढ़ता। मान्यता है कि एक बार राजपरिवार ने देवी की अनुमति के बिना हठपूर्वक उत्सव आरंभ करने का प्रयास किया था, जिसके बाद राजमहल में सर्प निकलने लगे थे। इसके बाद से यह मर्यादा पूर्ण आस्था के साथ निभाई जा रही है।

 

‘ठाकुर निकलना’ का अलौकिक दृश्य और सात दिनों के लिए अस्थायी शिविर में प्रभु

भेखली माता का संकेत मिलते ही नरसिंगों, करनाल और ढोल की थाप के बीच भगवान रघुनाथ और माता सीता की मूर्तियों को रथ में विराजमान किया जाता है। हजारों श्रद्धालु मोटी रस्सियों को हाथों में थामकर रथ को ढालपुर मैदान के केंद्र तक खींचते हैं। इस पवित्र अनुष्ठान को स्थानीय भाषा में ‘ठाकुर निकलना’ कहा जाता है, जिसके बाद रघुनाथ जी अगले सात दिनों के लिए अस्थायी शिविर में विराजते हैं।

 

देवता धूमल नाग का अलौकिक पराक्रम, खुद संभालते हैं भीड़ और ट्रैफिक की कमान

दशहरा उत्सव के दौरान ढालपुर मैदान में जब लाखों श्रद्धालुओं और सैकड़ों देव-पालकियों का सैलाब उमड़ता है, तो आधुनिक पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के साथ-साथ पारंपरिक व्यवस्था की कमान देवता धूमल नाग संभालते हैं। मान्यता है कि देवता धूमल नाग का रथ दैवीय शक्ति से स्वतः आगे बढ़ता हुआ भीड़ को नियंत्रित करता है और भगवान रघुनाथ के रथ के आगे-आगे चलकर सुगम मार्ग तैयार करता है। श्रद्धालु और देवलु देवता के हर दैवीय संकेत का पूरा सम्मान करते हैं।

 

छठे दिन 300 से अधिक देवी-देवताओं का अद्भुत ‘मोहल्ला’ और देव मिलन का उल्लास

उत्सव का छठा दिन सबसे भावुक और अद्भुत माना जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘मोहल्ला’ कहा जाता है। इस दिन समूची घाटी के 300 से अधिक देवी-देवता अपने-अपने शिविरों से निकलकर ढालपुर मैदान में एक साथ एकत्रित होते हैं। सभी देवी-देवता एक-दूसरे के सम्मुख झुककर पारंपरिक देव मिलन करते हैं और भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में शीश नवाते हैं। इस पावन अवसर पर हजारों देवलु और बजंतरी पूरी रात ढोल-नगाड़ों की थाप पर सामूहिक नाटी (नृत्य) करते हैं।

 

व्यास के पावन तट पर लंका दहन और पांच आंतरिक विकारों के भस्म होने की परंपरा

उत्सव के सातवें दिन भगवान रघुनाथ के रथ को माता हिडिंबा के रथ की अगुवाई में व्यास नदी के किनारे ले जाया जाता है। वहां सूखी घास और लकड़ियों से बनी प्रतीकात्मक लंका में अग्नि समर्पित की जाती है। प्राचीन काल से मनुष्य के आंतरिक विकारों काम, क्रोध, मद, लोभ और अहंकार के शमन के प्रतीक रूप में पांच जीवों की अष्टांग बलि देने की परंपरा थी। वर्ष 2014 में उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों में अब यह अनुष्ठान प्रतीकात्मक व मर्यादित रूप से निभाया जाता है, जिसके बाद माता हिडिंबा का रथ स्वतः मनाली लौट जाता है।

 

रथ के दाईं ओर चलने का ‘धुर विवाद’: श्रृंगा ऋषि और बालू नाग का पौराणिक दावा

कुल्लू दशहरे के इतिहास का एक अत्यंत संवेदनशील पहलू ‘धुर विवाद’ है, जिसका अर्थ है भगवान रघुनाथ के रथ के ठीक दाईं ओर चलने का ज्येष्ठ स्थान। बंजार के देवता श्रृंगा ऋषि के कारदारों का तर्क है कि उन्होंने राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करवाकर श्रीराम का प्राकट्य कराया था, अतः वे श्रेष्ठ हैं। दूसरी ओर, चैथर के देवता बालू नाग को शेषनाग अवतारी लक्ष्मण का स्वरूप माना जाता है, इसलिए उनके अनुयायी भाई के नाते दाईं ओर चलने का अपना स्वाभाविक अधिकार बताते हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर आस्था का सवाल और महर्षि जमदग्नि की मध्यस्थता

वर्ष 1977 तक व्यवस्था सामान्य रही, परंतु बाद के वर्षों में दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ गया और वर्ष 2000 में रथयात्रा के दौरान टकराव व पथराव तक की नौबत आ गई थी। इसके बाद प्रशासन ने दोनों प्रमुख देवताओं के मुख्य रथयात्रा में चलने पर रोक लगा दी और वर्तमान में यह प्रकरण देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में विचाराधीन है। दोनों देवताओं को निमंत्रण तो मिलता है परंतु वे शिविरों में ही विराजते हैं, जबकि रथ के दाईं ओर चलने की पावन भूमिका महर्षि जमदग्नि ऋषि निभाते हैं।

 

वर्ष 1971 का वो दर्दनाक गोलीकांड और डॉ. परमार द्वारा परंपरा का पुनरुद्धार

आधुनिक काल में वर्ष 1971 के दशहरा उत्सव के दौरान ढालपुर मैदान में अचानक भगदड़ और गोलीकांड हुआ था, जिसमें श्यामा नामक कांगड़ा के युवक की जान चली गई थी। इस दुखद घटना की टीस आज भी स्थानीय लोकगीतों (‘ओ मेरी गोलीएं, ओ मेरी बंदूके… श्यामा मारू लोके री झीके ओ ‘) में सुनाई देती है। इस त्रासदी के चलते वर्ष 1972 और 1973 में दो वर्षों तक कुल्लू दशहरा नहीं मनाया गया, जिसे बाद में वर्ष 1974 में हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. परमार की विशेष पहल पर दोबारा पूरी गरिमा के साथ शुरू किया गया।

 

वर्ष 2014 में जब चोरी हुई थीं रघुनाथ जी की मूर्तियां और चूल्हा तक नहीं जला था

दशहरे के इतिहास का सबसे स्तब्ध करने वाला क्षण 9 दिसंबर 2014 की रात आया, जब सुल्तानपुर मंदिर से नेपाली चोरों ने भगवान रघुनाथ, सीता, नरसिंह, हनुमान, गणपति और शालिग्राम की मूर्तियां चुरा लीं। इस घटना से समूची घाटी में शोक छा गया और कई दिनों तक घरों में चूल्हे तक नहीं जले। पुलिस के व्यापक अभियान के बाद बजौरा के पास पत्थरों के बीच से ये बहुमूल्य मूर्तियां बरामद कर ली गईं और 2015 में ठीक बसंत पंचमी से पूर्व भगवान के लौटने पर पूरी घाटी में दीपोत्सव मनाया गया।

 

शाही जलेब में नृसिंह भगवान की कटार और 360 साल पुराना सुरक्षा पहरा

दशहरे के दूसरे से छठे दिन तक कुल्लू नगर में निकलने वाली ‘शाही जलेब’ का इतिहास 360 वर्ष पुराना है। प्राचीन समय में जब सैकड़ों देवी-देवता सोने-चांदी के आभूषणों के साथ खुले तंबुओं में बैठते थे, तो असामाजिक तत्वों और डाकुओं से सुरक्षा के लिए राजा स्वयं भगवान नृसिंह की कटार लेकर नगर परिक्रमा करते थे। आज भी रघुनाथ जी के मुख्य छड़ीबरदार पारंपरिक पालकी में भगवान नृसिंह की पवित्र कटार धारण कर राजसी ठाठ-बाट के साथ इस सुरक्षा परिक्रमा का निर्वहन करते हैं।

 

सात दिनों तक ऋषि जैसा जीवन जीते हैं देवलु

दशहरा उत्सव के सातों दिन तक देवी-देवताओं के साथ आए गूर, पुजारी, कारदार और बजंतरी अत्यंत कठोर धार्मिक नियमों से बंधे रहते हैं। वे शिविरों में जमीन पर शयन करते हैं, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और बाहर की किसी दुकान का अन्न या चाय तक ग्रहण नहीं करते। जब श्रद्धालु देवताओं के सोने-चांदी जड़े रथों को अपने कंधों पर उठाते हैं, तो रथ दैवीय ऊर्जा के प्रभाव से स्वतः दिशा बदलता है। श्रद्धालु इस अलौकिक गति और झूलन को ही साक्षात ‘देव नृत्य’ मानते हैं।

 

1966 के राज्य उत्सव से लेकर वैश्विक पटल पर चमकती हिमाचल की पहचान

आजादी के बाद वर्ष 1966 में कुल्लू दशहरा को राज्य स्तरीय उत्सव का दर्जा दिया गया और वर्ष 1970 में अंतरराष्ट्रीय स्तर की घोषणा के बाद 2017 में इसे औपचारिक मान्यता मिली। वर्ष 1990 के बाद से इसमें विदेशी सांस्कृतिक दलों की भागीदारी शुरू हुई। आज यह आयोजन न केवल 300 से अधिक देवी-देवताओं का आध्यात्मिक समागम है, बल्कि रूस, अमेरिका, इंडोनेशिया, थाईलैंड सहित कई देशों के कलाकारों के संगम और करोड़ों रुपये के हस्तशिल्प व ग्रामीण व्यापार का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

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