रमेश कंवर: शिमला
Himachal News: हिमाचल प्रदेश के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों और ग्लेशियरों के पिघलने से उत्पन्न संभावित आपदा जोखिम को देखते हुए प्रशासन अलर्ट मोड पर आ गया है। लाहौल घाटी में स्थित संवेदनशील घेपन ग्लेशियल झील के बढ़े हुए जलस्तर के खतरे को भांपते हुए प्रशासनिक और विशेषज्ञ अधिकारियों की एक विशेष टीम ने झील क्षेत्र का मौके पर जाकर स्थल निरीक्षण किया। यह कदम संभावित बाढ़ या झील फटने (GLOF) के खतरे से स्थानीय बस्तियों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।
निरीक्षण दल ने सिस्सु से लगभग 14 किलोमीटर की अत्यंत दुर्गम और कठिन पैदल चढ़ाई तय कर करीब 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान झील के वर्तमान जलस्तर, आसपास के ढलानों की भौगोलिक स्थिति, संभावित जल बहाव मार्गों और ग्लेशियर के पिघलने की गति का बारीकी से अध्ययन किया गया।
15 अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम ने किया स्थल आकलन
इस महत्वपूर्ण आपदा प्रबंधन अभियान में विभिन्न सरकारी विभागों के 15 अधिकारियों एवं तकनीकी कर्मचारियों की संयुक्त टीम शामिल रही। स्थल पर आवश्यक तकनीकी आकलन के बाद अधिकारियों ने झील के मुहाने और आसपास के संभावित जोखिम क्षेत्रों की मैपिंग की।
अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और मॉक ड्रिल को मजबूत करने पर बल
निरीक्षण के दौरान आपदा से निपटने की तैयारियों को पुख्ता करने के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, निकासी योजना, नियमित निगरानी व्यवस्था, वैज्ञानिक आकलन और समय-समय पर मॉक ड्रिल आयोजित करने पर विस्तृत चर्चा की गई।
बदलते मौसम के बीच अंतर-विभागीय समन्वय और पूर्व तैयारी पर जोर
ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में पल-पल बदलते मौसम को ध्यान में रखते हुए सभी संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि निचले तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए झील की निरंतर निगरानी और पूर्व तैयारी ही सबसे कारगर उपाय है।