शिमला के ‘वेला बॉबी’ का जन्मदिन: रोज 3,000 मरीजों का पेट भरने वाले मसीहा, जिन्हें पत्नी ने किडनी देकर लौटाया नया जीवन; आपदा में बने थे संकटमोचक

Sarabjeet Singh Bobby

रमेश कंवर: शिमला

Sarabjeet Singh Bobby: राजधानी शिमला की सड़कों पर लोग जिन्हें प्यार से ‘वेला बॉबी’ पुकारते हैं और अस्पतालों में लाचार तीमारदार व मरीज ‘मसीहा’ मानते हैं, उस निस्वार्थ समाजसेवी सरबजीत सिंह बॉबी का 10 अक्टूबर को जन्मदिन है। सेवा, करुणा और असीम समर्पण का पर्याय बन चुके सरबजीत सिंह बॉबी की संस्था ‘अलमाइटी ब्लेसिंग्स’ आज केवल शिमला ही नहीं, बल्कि समूचे हिमाचल प्रदेश में मानवता की सबसे मजबूत मिसाल बनकर खड़ी है।

 

12 साल की उम्र में छूटी पढ़ाई, संभाली जूतों की दुकान

10 अक्टूबर 1973 को शिमला के ऐतिहासिक रिपन अस्पताल (डीडीयू) में जन्मे सरबजीत सिंह बॉबी का प्रारंभिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। वह शिमला के प्रतिष्ठित सेंट एडवर्ड्स स्कूल में कक्षा छठी में पढ़ते थे, तभी पारिवारिक परिस्थितियां प्रतिकूल हो गईं। तीन छोटी बहनों की शिक्षा और परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी कंधों पर आने के कारण मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और लोअर बाजार स्थित जूतों की दुकान संभाल ली। संघर्ष के उन दिनों ने उनके भीतर दूसरों के दुख-दर्द को समझने की गहरी संवेदनशीलता भर दी।

 

एक केतली चाय से शुरू हुआ सफर, अब रोज 3,000 लोगों को निशुल्क भोजन

25 अक्टूबर 2014 को सरबजीत सिंह बॉबी ने आईजीएमसी (IGMC) कैंसर अस्पताल के बाहर महज एक केतली चाय और बिस्कुट बांटकर सेवा की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे यह कारवां बढ़ता गया और उनकी संस्था ‘अलमाइटी ब्लेसिंग्स’ के माध्यम से आज प्रतिदिन 3,000 से अधिक उपचाराधीन मरीजों व उनके तीमारदारों को पौष्टिक और निःशुल्क भोजन उपलब्ध करवाया जा रहा है। अब तक लाखों जरूरतमंद इस लंगर से भोजन प्राप्त कर चुके हैं।

 

5,000 से अधिक लावारिस शवों अंतिम संस्कार

इसके अतिरिक्त, सरबजीत सिंह बॉबी रक्तदान और अंतिम संस्कार सेवाओं में भी निरंतर अग्रिम पंक्ति में रहते हैं। शिमला के रिज मैदान पर हर रविवार नियमित रक्तदान शिविर लगाकर अब तक 30,000 यूनिट से अधिक रक्त एकत्र करवाया जा चुका है। वहीं, जब रात के अंधेरे में लावारिस या संक्रामक बीमारियों से मृत व्यक्तियों के पार्थिव शरीर को ले जाने से कोई कतराता है, तब बॉबी स्वयं शव वाहन की स्टेयरिंग संभालते हैं। वे अब तक 5,000 से अधिक लावारिस शवों का पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार करवा चुके हैं।

 

मंडी आपदा में बने संकटमोचक: बिना प्रचार बांटी 1 करोड़ से अधिक की राहत

हिमाचल प्रदेश में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के दौरान जब मंडी, सेराज और कुल्लू की वादियां तबाह हो गईं, तब सरबजीत सिंह बॉबी ने वास्तविक संकटमोचक की भूमिका निभाई। प्रशासनिक राहत औपचारिकताओं के बीच उन्होंने जनसहयोग से 1 करोड़ रुपये से अधिक की राहत राशि और सामग्री जुटाई। ट्रकों में राशन, बिस्तर, बर्तन और दवाइयां लेकर वे उन दुर्गम गांवों तक पहुंचे जहां वाहन तक नहीं जा पा रहे थे। आपदा पीड़ितों के स्वाभिमान का ख्याल रखते हुए उन्होंने बिना किसी मंच, भाषण या प्रचार के सैकड़ों प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में 25-25 हजार रुपये की सीधी नकद आर्थिक सहायता भेजी, ताकि वे अपनी तात्कालिक जरूरतें पूरी कर सकें।

 

पत्नी ने किडनी देकर दी नई जिंदगी

वर्ष 2020 में सरबजीत सिंह बॉबी की दोनों किडनियां खराब (फेल) हो गई थीं और वे जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। उस कठिन दौर में उनकी धर्मपत्नी उनके लिए जीवनदायिनी बनीं। वर्ष 2021 में अपनी शादी की 25वीं सालगिरह पर उनकी पत्नी ने अपनी एक किडनी दान देकर उन्हें नया जीवन प्रदान किया, ताकि समाज सेवा की यह लौ बुझने न पाए।

 

चुनौतियों और गंभीर बीमारियों के बीच आज भी जारी है सेवा

स्वास्थ्य की तमाम चुनौतियों और गंभीर मधुमेह (डायबिटीज) के बावजूद बॉबी आज भी उसी ऊर्जा के साथ लंगर की कड़छी संभालते हैं। अपने उपनाम ‘वेला’ पर मुस्कुराते हुए वे अक्सर कहते हैं-“हां, मैं वेला हूं, क्योंकि परमात्मा ने मुझे वेला इसलिए बनाया ताकि मैं अपनों के दुख-दर्द में काम आ सकूं।” आज उनके जन्मदिन के अवसर पर शिमला, मंडी और प्रदेश भर के हजारों लोग उनकी लंबी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य की प्रार्थना कर रहे हैं।

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