रमेश कंवर: शिमला
Shimla News: हिमाचल प्रदेश में कभी गांव के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और बेहतर शिक्षा के लिए ग्रामीणों द्वारा दान की गई पुश्तैनी जमीन अब चर्चा का मुख्य विषय बन गई है। प्रदेश में विद्यार्थियों की कम संख्या के कारण कई सरकारी स्कूलों के बंद होने और अन्य नजदीकी स्कूलों में मर्ज किए जाने के बाद, जमीन दान देने वाले ग्रामीणों ने अपनी जमीन वापस मांगने की कवायद शुरू कर दी है। इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा विभाग ने प्रदेश भर से रिपोर्ट तलब की है।
प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा निदेशक आशीष कोहली ने सभी जिलों के उपनिदेशकों (डीईओ) को आधिकारिक पत्र जारी कर ऐसे सभी मामलों का पूरा ब्योरा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि रतन साईं बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार मामले में न्यायालय में चल रही सुनवाई के दौरान विभाग को जमीन से जुड़े दस्तावेज, इंतकाल और अन्य रिकॉर्ड अदालत तथा सरकार के समक्ष पेश करने हैं। विभाग अब बंद और चल रहे स्कूलों की जमीन से जुड़े आंकड़ों को जुटाने में जुट गया है।
शिक्षा विभाग ने चार श्रेणियों में मांगी जमीन की जानकारी
मामले के सही आकलन और पारदर्शी रिपोर्ट तैयार करने के लिए शिक्षा विभाग ने अधिकारियों से चार प्रमुख श्रेणियों में जानकारी मांगी है। पहली श्रेणी में ऐसे स्कूल शामिल हैं जो पूरी तरह बंद हो चुके हैं या मर्ज हो गए हैं, लेकिन उनकी जमीन के दानपत्र और इंतकाल का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। दूसरी श्रेणी में ऐसे बंद या मर्ज हो चुके स्कूल रखे गए हैं, जिनकी जमीन के दस्तावेज तो मौजूद हैं, लेकिन दानदाता अब अपनी जमीन वापस मांग रहे हैं। तीसरी श्रेणी में वर्तमान में चल रहे ऐसे स्कूल शामिल हैं, जिनकी जमीन के दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन दानदाता फिर भी अपनी जमीन वापस लेने का दावा कर रहे हैं। चौथी श्रेणी में ऐसे संचालित स्कूल शामिल हैं, जिनके लिए जमीन दान तो दी गई थी, परंतु अभी तक इंतकाल की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है।
पौने चार साल में 1526 स्कूल बंद व मर्ज, डी-नोटिफाई की गई शून्य दाखिले वाली पाठशालाएं
हिमाचल प्रदेश में पिछले पौने चार वर्षों के दौरान सरकार ने कुल 1,526 सरकारी स्कूलों को बंद किया है या पास के स्कूलों में मर्ज किया है। जिन प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या शून्य थी, उन्हें सरकार द्वारा डी-नोटिफाई कर दिया गया। वहीं, जिन शिक्षण संस्थानों में 5 या उससे कम छात्र पंजीकृत थे, उन्हें निकटतम स्कूलों में समायोजित किया गया। अब इन बंद पड़े स्कूलों के भवनों और उनसे जुड़ी भूमि का मालिकाना हक वापस पाने के लिए ग्रामीणों द्वारा उठाई जा रही मांग ने विभाग की चिंता बढ़ा दी है।