आलेख: रमेश कंवर
देवभूमि हिमाचल प्रदेश अपनी अनूठी देव संस्कृति और आस्था के लिए पूरे विश्व में विख्यात है। हिमालय की गोद में बसे प्रदेश के हर गांव के अपने आराध्य ग्राम देवता हैं। इन्हीं महान देव शक्तियों में मंडी और कुल्लू जिले के सीमांत क्षेत्र सराज के अधिष्ठाता देव ‘श्री हरि विष्णु मतलोड़ा’ (Shri Hari Vishnu Matloda) का स्थान अत्यंत विशिष्ट और सर्वोपरि है। 18 गढ़ सराज, 9 गढ़ नाचन और 24 से अधिक पंचायतों के राजा माने जाने वाले प्रभु मतलोड़ा जी को सराज घाटी का ‘बड़ा देव’ भी कहा जाता है।
पौराणिक मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार, देव श्री विष्णु मतलोड़ा जी का अवतरण सीधा बैकुंठ धाम से हिमाचल की इस पावन धारा पर हुआ था। प्राचीन देव कथाओं में उल्लेख मिलता है कि देवता साहिब के एक ही हथौड़े के प्रहार से क्षेत्र में नमक की खदानें प्रकट हुई थीं। सराज क्षेत्र के लगभग 50 प्रतिशत भूभाग पर फैला उनका हार (देव क्षेत्र) उनकी अगाध अलौकिक शक्तियों और विशाल जन-आस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मंडी रियासत के राजा नंगे पैर करते थे स्वागत
रियासत काल से ही मंडी के राजपरिवार की देव श्री विष्णु मतलोड़ा जी में अटूट आस्था रही है। कहा जाता है कि जब काशी से आए प्रकांड विद्वान और ब्राह्मण मंडी राजमहल की आधारशिला रखने में असमर्थ सिद्ध हो रहे थे, तब देवता साहिब के शगलोट पुजारी ने अपनी देव शक्तियों से पलभर में आधारशिला रखवा दी थी। तत्कालीन मंडी राजा विजय सेन प्रभु के आगमन पर नंगे पांव शोलीखड्ड तक स्वागत के लिए जाते थे और राजमहल पहुंचने पर उन्हें अपने से भी ऊंचे स्थान (धुर) पर विराजित कर स्वयं पीछे बैठते थे।
महिला के आंचल से लिपटकर किया दैत्य का संहार
एक अन्य प्राचीन देव कथा के अनुसार, जब प्रभु बाल रूप में मंडी की भाटकीधार पहुंचे, तो उनका सामना ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त दैत्य मडभखन देवी से हुआ। दैत्य के वरदान की मर्यादा रखते हुए प्रभु बाल रूप में एक स्थानीय महिला के आंचल में छिप गए और फिर उस देव महिला की सहायता से महाबली दैत्य का संहार किया। इसी ऐतिहासिक पौराणिक घटना के कारण देव श्री विष्णु मतलोड़ा जी की हर धार्मिक पूजा-अर्चना और कार-सेवा में महिलाओं की उपस्थिति को अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।