रमेश कंवर: देहरादून
Uttarkashi News: हिमालयी क्षेत्र में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तनों के कारण ग्लेशियल झीलों से अचानक बाढ़ आने के भविष्य के जोखिम को लेकर वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है। राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (एनआइएच) रुड़की के वैज्ञानिकों के ऊपरी गंगा बेसिन में केदारताल झील पर किए अध्ययन से पता चला है कि गत 35 वर्ष में इसके क्षेत्रफल में लगभग 64 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नतीजों से पता चलता है कि झील अब कई दशक पहले की तुलना में काफी अधिक पानी जमा कर रही है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने इस झील की लगातार निगरानी और बेहतर तैयारी की जरूरत पर जोर दिया है।
रुड़की स्थित एनआइएच के वैज्ञानिकों की टीम ने उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित केदारताल झील में हुए बदलावों को समझने के लिए सैटेलाइट इमेज और पुराने आंकड़ों की जांच की। एनआइएच रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. लवकुश कुमार पटेल ने बताया कि अध्ययन में पाया गया कि 1990 की तुलना में केदारताल झील का क्षेत्रफल करीब 64,456 वर्ग मीटर से बढ़कर 2025 तक 1,33,823 वर्ग मीटर हो गया था।
प्राकृतिक रुकावट टूटने पर केदार-गंगा घाटी में बाढ़ का खतरा
क्षेत्रफल बढ़ने से अब झील कई दशक पहले की तुलना में काफी ज्यादा पानी जमा कर रही है। उन्होंने बताया कि शोध में कंप्यूटर आधारित बाढ़ सिमुलेशन का भी इस्तेमाल किया गया, जिससे कि यह समझा जा सके कि अगर झील की प्राकृतिक रुकावट अचानक टूट जाती है तो सबसे खराब स्थिति में क्या हो सकता है।
45 मिनट में गंगोत्री पहुंच सकती है बाढ़ की विनाशकारी लहर
सिमुलेशन से पता चला कि बाढ़ की एक शक्तिशाली लहर केदार-गंगा घाटी से तेजी से गुजर सकती है। इस काल्पनिक स्थिति में बाढ़ की लहर लगभग 45 मिनट में गंगोत्री क्षेत्र तक पहुंच सकती है। हालांकि नीचे की ओर बढ़ते हुए इसकी ताकत कम हो जाएगी।
घाटी के संकरे हिस्सों और नदी संगम के पास तबाही की आशंका
इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि घाटी के संकरे हिस्सों में पानी का स्तर कई मीटर तक बढ़ सकता है, जबकि नदी के संगम के पास के इलाकों और आबादी वाले क्षेत्रों में भारी बाढ़ आ सकती है। ये नतीजे बताते हैं कि किसी असल आपात स्थिति के आने से पहले ही खतरे वाले इलाकों की पहचान करना कितना जरूरी हो गया है।
संभावित खतरे से निपटने और पूर्व-तैयारी के लिए अध्ययन
डॉ. लवकुश पटेल कहते हैं कि हालांकि यह अध्ययन यह भविष्यवाणी नहीं करता है कि केदारताल से ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ की घटना होगी ही, बल्कि यह सबसे खराब स्थिति का आकलन करता है ताकि संभावित नतीजों को समझा जा सके और अधिकारियों को ऐसी घटना के लिए तैयार रहने में मदद मिल सके।
अध्ययन दल में शामिल रहे एनआइएच रुड़की के प्रमुख वैज्ञानिक
भले ही ऐसी घटना होने की संभावना कम हो लेकिन यह खतरनाक हो सकती है। अध्ययन करने वाली वैज्ञानिकों की टीम में शिव शंकर यादव, आदर्श पाढ़ी, मधुसूदन थपलियाल और सुरजीत सिंह शामिल हैं।