तत्तापानी: सतलुज के तट पर आस्था, इतिहास, संघर्ष और परिवर्तन की महागाथा

Tattapani

आलेख: रमेश कंवर

Tattapani: हिमाचल प्रदेश की सतलुज नदी के तट पर बसा तत्तापानी उन विरले स्थानों में है जहां प्रकृति, आस्था, रियासती इतिहास, लोकतांत्रिक आंदोलन और आधुनिक विकास की सभी परतें एक दूसरे पर चढ़ी दिखाई देती हैं। कभी सतलुज के कंकरीले किनारों से स्वतः फूटते गर्म जलस्रोत इसकी पहचान थे। लोकविश्वास ने इन्हें महर्षि जमदग्नि और भगवान परशुराम से जोड़ा। मकर संक्रांति, तुलादान और शनिदान की परंपराओं ने इसे एक प्रमुख तीर्थ बनाया। सुकेत रियासत के दौर में इसकी भौगोलिक स्थिति ने इसे सीमांत संपर्क क्षेत्र बनाया। फरवरी 1948 में यह सुकेत सत्याग्रह का महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु बना। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद 1952 में यहां पहुंचे। इक्कीसवीं सदी में कोलडैम ने पुराने तत्तापानी के लगभग पूरे नदी तटीय भू दृश्य को बदल दिया।

तत्तापानी मंडी और शिमला जिला की सीमा पर बसा एक छोटा सा कस्बा है। शिमला शहर से इसकी दूरी लगभग 50 किलोमीटर है। इसी भौगोलिक निकटता के कारण इसे प्रायः “शिमला के निकट तत्तापानी” के रूप में जाना जाता है, जबकि प्रशासनिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह मंडी जिले तथा पुरानी सुकेत रियासत का हिस्सा रहा है। सतलुज के दूसरी ओर सुन्नी तथा शिमला की पहाड़ियों और इस ओर करसोग–सुकेत क्षेत्र की स्थिति ने तत्तापानी को सदियों तक एक केंद्र बनाए रखा। यही भौगोलिक स्थिति बाद में 1948 के सुकेत सत्याग्रह में भी महत्वपूर्ण साबित हुई।

 

धम्बोले‘: जब नदी किनारे धरती उगलती थी खौलता पानी

तत्तापानी का नाम ही इसकी सबसे प्रसिद्ध विशेषता का परिचय देता है। स्थानीय पहाड़ी बोली में ‘तत्ता’ का अर्थ गर्म और ‘पानी’ का अर्थ जल है। अर्थात तत्तापानी वह स्थान जहां गर्म पानी निकलता है। पुराने तत्तापानी में गर्म जल किसी पाइप या मशीन से नहीं आता था। सतलुज के कंकरीले तट पर जमीन के भीतर से पानी स्वतः फूटता था। स्थानीय लोग इन स्थानों के चारों ओर पत्थर जमा कर छोटे छोटे कुंड बना लेते थे, जिन्हें स्थानीय स्मृति में ‘धम्बोले’ कहा जाता था। पानी इतना गर्म होता था कि उसमें सतलुज का ठंडा पानी मिलाकर स्नान योग्य बनाना पड़ता था। एक तरफ कड़ाके की ठंड में बहती बर्फीली सतलुज और महज दो कदम दूर धरती से निकलता भापयुक्त गर्म जल यह दृश्य पीढ़ियों तक तत्तापानी का सबसे बड़ा आकर्षण बना रहा।

 

खौलते पानी का वैज्ञानिक रहस्य

तत्तापानी केवल धार्मिक विश्वास का स्थल नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण भू तापीय (Geothermal) क्षेत्र भी है। हिमालय की गहराई में मौजूद दरारों से पानी नीचे जाता है, पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा से गर्म होता है और सल्फर युक्त होकर सतह पर वापस लौटता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसमें स्नान करने से त्वचा और जोड़ों के दर्द में चमत्कारी राहत मिलती है। ब्रिटिश काल में कैप्टन पाल्मर ने मशोबरा से तत्तापानी तक एक भूगर्भीय सर्वेक्षण (Geological Traverse) किया था और यहां की चट्टानी संरचनाओं को “Mule Track Series” नाम दिया था। इससे स्पष्ट है कि तत्तापानी केवल तीर्थयात्रियों के लिए ही नहीं बल्कि हिमालय की संरचना का अध्ययन करने वाले भूवैज्ञानिकों के लिए भी रुचि का क्षेत्र था।

 

महर्षि जमदग्नि के वस्त्र और परशुराम का ताप

तत्तापानी की धार्मिक पहचान का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण तत्व महर्षि जमदग्नि से जुड़ी परंपरा है। लोकविश्वास के अनुसार तत्तापानी और आसपास की गुफाएं जमदग्नि ऋषि की तपस्या स्थली रही हैं। एक कथा के अनुसार महर्षि जमदग्नि अथवा उनके पुत्र भगवान परशुराम की तपस्या के प्रभाव से यहां गर्म जल प्रकट हुआ। एक अन्य लोकप्रिय कथा यह भी है कि जमदग्नि ऋषि द्वारा स्नान के बाद अपने वस्त्र निचोड़ने से जो जल की बूंदे गिरीं, वही गर्म जलस्रोत बन गईं। आज भी ऐसी कथाएं स्थानीय जनश्रुति और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

 

तुलादान, शनिदान और मकर संक्रांति का दिव्य स्नान

तत्तापानी का सबसे भव्य धार्मिक पर्व मकर संक्रांति है। जनवरी की हाड़ कंपाने वाली ठंड में हजारों लोग यहां पवित्र स्नान के लिए जुटते हैं। पुराने तत्तापानी में पूरा धार्मिक आयोजन सतलुज के किनारे केंद्रित होता था। यहां की सबसे अनोखी परंपरा तुलादान थी, जहां व्यक्ति को तराजू के एक पलड़े में बैठाकर उसके वजन के बराबर अनाज, तिल या गुड़ दान किया जाता था। इसके अलावा शनिवार और पर्वों पर शनि दोष निवारण के लिए सतलुज तट पर तंबू लगाकर शनिदान कराया जाता था। तत्तापानी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि जन आस्था और सतलुज के संगम से रची बसी एक जीवंत तीर्थ संस्कृति था।

 

सुकेत रियासत और 1948 का ऐतिहासिक सुकेत सत्याग्रह

तत्तापानी का राजनीतिक इतिहास सुकेत रियासत के वैभव और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। मंडी जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार सुकेत राज्य की स्थापना 765 ईस्वी में राजा बीर सेन ने की थी। बाद में 1846 की ब्रिटिश सिख संधि के बाद यह ब्रिटिश प्रभाव में आया। स्वतंत्रता के बाद जब सुकेत के राजा ने भारत संघ में विलय से हिचकिचाहट दिखाई, तब पंडित पदम देव के नेतृत्व में लगभग 1,000 अहिंसक सत्याग्रही तत्तापानी में एकत्र हुए। 18 फरवरी 1948 को सत्याग्रहियों ने तत्तापानी से सुकेत रियासत की ओर कूच किया। इस जनांदोलन ने रियासती सत्ता को झुका दिया। सुकेत सत्याग्रह की सफलता के बाद 15 अप्रैल 1948 को आधुनिक हिमाचल प्रदेश का गठन हुआ और सुकेत का मंडी में विलय होकर नया मंडी जिला बना।

 

जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद पहुंचे तत्तापानी

22 सितंबर 1952 में तत्तापानी के इतिहास में स्वर्णिम पन्ना जुड़ा, जब स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद यहां आए। उन्होंने श्रद्धालुओं के लिए बनाए गए एक विशेष गर्म जल स्नान सरोवर का उद्घाटन किया। उस दौर में दुर्गम पहाड़ियों को पार कर राष्ट्रपति का यहां पहुंचना यह साबित करता है कि तत्तापानी की महिमा राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुकी थी। हालांकि वह मूल कुंड कोलडैम के जल में समा गया, लेकिन उस उद्घाटन पट्टिका को स्थानीय उद्यमी प्रेम लाल रैणा ने संभाल कर सुरक्षित रखा है, जो आज भी उस गौरवशाली दिन का सबसे बड़ा भौतिक साक्ष्य है।

 

रवीन्द्रनाथ टैगोर की यात्रा: एक रहस्यमयी पन्ना

तत्तापानी के इतिहास में रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम भी जुड़ता है। कई मीडिया रिपोर्टों का दावा है कि टैगोर 1938 में तत्तापानी आए थे। यद्यपि टैगोर का 1893 में शिमला आना और वुडफील्ड में ठहरना पूरी तरह प्रमाणित है, परंतु 1938 की उनकी तत्तापानी यात्रा का कोई समकालीन दस्तावेजी प्रमाण मिलना अभी बाकी है। इतिहासकार इसे एक महत्वपूर्ण और रोमांचक दावा मानते हैं, जिसकी पुष्टि हेतु अनुसंधान जारी है।

 

2015 का महा परिवर्तन: जब कोलडैम की झील में समा गया पुराना तत्तापानी

वर्ष 2015 में 800 मेगावाट की कोलडैम जलविद्युत परियोजना का जलाशय भरने के साथ तत्तापानी की काया ही पलट गई। नदी के किनारे, पुराने प्राकृतिक धम्बोले, घाट और राफ्टिंग स्ट्रेच हमेशा के लिए जलमग्न हो गए।

 

1995 किलो खिचड़ी का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड

14 जनवरी 2020 को मकर संक्रांति के अवसर पर हिमाचल पर्यटन विभाग ने तत्तापानी में एक ही बर्तन में 1,995 किलोग्राम खिचड़ी बनाकर रिकार्ड बनाया और इसे गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड (“Largest serving of beans and rice”) में अपना नाम दर्ज कराया। यह पारंपरिक पर्व और आधुनिक पर्यटन ब्रांडिंग का अद्भुत संगम था।

 

तत्तापानी का बदलता स्वरूप

तत्तापानी के सफर को मुख्य रूप से तीन अध्यायों में देखा जा सकता है। पहला अध्याय प्राकृतिक व धार्मिक तत्तापानी का था, जिसमें सतलुज के प्राकृतिक धम्बोले, जमदग्नि परंपरा, तुलादान व सुकेत सत्याग्रह मुख्य थे। दूसरा अध्याय उभरते पर्यटन का रहा, जिसमें सड़क मार्ग, वेलनेस सेंटर, होमस्टे व सतलुज में रिवर राफ्टिंग शामिल हुई। तीसरा अध्याय आधुनिक कोलडैम का है, जिसमें विशाल झील, बोअरवेल सल्फर बाथ, वाटर स्पोर्ट्स व गिनीज रिकॉर्ड नई पहचान बने हैं। कोलडैम ने पुराना तट भले छीन लिया हो, लेकिन उसने एडवेंचर स्पोर्ट्स के लिए एक नया दरवाजा खोल दिया। आज यहां की शांत झील में मोटर बोट, जेट स्की और बोटिंग का रोमांच पर्यटकों को खींच लाता है। यहां सालाना 50 से 60 हजार पर्यटक पहुंच रहे हैं।

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