रमेश कंवर: कुल्लू
Himachal News: कुल्लू की समृद्ध देव-परंपरा, लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में देव संस्कृति शोध संस्थान ने एक महत्वपूर्ण भाषाई एवं सांस्कृतिक आग्रह किया है। संस्थान का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा के दौरान देवताओं को अर्पित की जाने वाली राशि अथवा उपहार के लिए प्रचलित नज़राना शब्द के स्थान पर देव-भेंट जैसे अधिक आत्मीय और सम्मानपूर्ण शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए।
संस्थान की ओर से कहा गया कि देवता को धन नहीं दिया जाता, बल्कि केवल श्रद्धा अर्पित की जाती है। धन उस श्रद्धा का मात्र एक जरिया है। कुल्लू की देव संस्कृति में देवता के प्रति अर्पित की जाने वाली प्रत्येक वस्तु केवल आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि श्रद्धा, सम्मान, कृतज्ञता और समर्पण की अभिव्यक्ति है, इसलिए शब्दावली भी उसी भावभूमि को व्यक्त करने वाली होनी चाहिए।
नज़राना के स्थान पर देव-भेंट शब्द अधिक आत्मीय और श्रद्धापूर्ण
संस्थान ने स्पष्ट किया कि यह किसी प्रचलित शब्द का विरोध नहीं है और न ही किसी भाषा या परंपरा के प्रति असम्मान का भाव है। नज़राना शब्द अपने ऐतिहासिक संदर्भ में भेंट अथवा सम्मान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, लेकिन कुल्लू की अपनी देव-परंपरा के संदर्भ में देव-भेंट शब्द अधिक आत्मीय, सांस्कृतिक और श्रद्धापूर्ण भाव व्यक्त करता है। कुल्लू दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हिमालय की जीवंत देव-संस्कृति का विराट मंच है। यहां आने वाले देवता, देव रथ, देवलू, बजंतरी और श्रद्धालु सदियों पुरानी लोक परंपरा के वाहक हैं, इसलिए इस परंपरा से जुड़े शब्दों में भी हमारी अपनी सांस्कृतिक चेतना और सम्मान झलकना चाहिए।
देव समाज, आयोजकों और मीडिया से बदलाव पर विचार करने की अपील
संस्थान ने समाज, देव समाज, दशहरा आयोजन समिति और मीडिया से विनम्र आग्रह किया है कि नज़राना के स्थान पर देव-भेंट शब्द को सम्मानपूर्वक अपनाने पर विचार किया जाए। यह पहल किसी शब्द को जबरन हटाने की नहीं, बल्कि अपनी देव-संस्कृति की मौलिक शब्दावली को सम्मान देने की एक सार्थक कोशिश है। देव संस्कृति शोध संस्थान ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की स्मृति, आस्था और पहचान को भी अपने भीतर संजोए रखती है। इसलिए अपनी देव परंपरा के लिए सम्मानपूर्ण शब्दों का संरक्षण भी सांस्कृतिक संरक्षण का ही एक हिस्सा है।
देव परंपरा में शब्दावली के संरक्षण को बताया सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक
संस्थान का मानना है कि कुल्लू घाटी में मनाए जाने वाले इस ऐतिहासिक उत्सव की मौलिकता को बनाए रखने के लिए पुरानी शब्दावली में सुधार जरूरी है। जब शब्द स्थानीय आस्था से जुड़ते हैं, तो उनका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। स्थानीय देव प्रतिनिधियों और शोधकर्ताओं ने भी इस विचार का समर्थन किया है। उनका मानना है कि आने वाली पीढ़ियों को सही सांस्कृतिक शब्दों से अवगत कराना बेहद जरूरी है ताकि परंपरा का वास्तविक स्वरूप बना रहे।
कुल्लू दशहरा की ऐतिहासिकता को नई पहचान देने का प्रयास
अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में हर साल सैकड़ों देवी-देवता अपने देवलुओं के साथ शिरकत करते हैं। इस दौरान सरकार और प्रशासन की ओर से नजराना राशि प्रदान की जाती है, जिसे अब देव-भेंट नाम देने का सुझाव दिया गया है। इस भाषाई बदलाव से न केवल उत्सव की गरिमा बढ़ेगी, बल्कि देव समाज की वर्षों पुरानी आत्मीय भावना को भी बल मिलेगा। देव संस्कृति शोध संस्थान को उम्मीद है कि इस सुझाव को व्यापक समर्थन मिलेगा।