India News: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और मिसाइल मैन के नाम से विख्यात पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के बीच का संबंध भारतीय राजनीतिक और वैज्ञानिक इतिहास के सबसे आत्मीय व प्रेरणादायक अध्यायों में से एक है। दोनों विभूतियों की पहली मुलाकात अगस्त 1980 में उस वक्त हुई थी, जब भारत के पहले उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 (SLV-3) के सफल प्रक्षेपण के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने डॉ. कलाम और प्रोफेसर सतीश धवन को देश के प्रमुख सांसदों से भेंट कराने के लिए आमंत्रित किया था।
साधारण चप्पल पहनकर संसद पहुंचे कलाम
तत्कालीन प्रधानमंत्री की ओर से जब सांसदों से मिलने का न्योता मिला, तो बेहद सादगीपसंद डॉ. कलाम संकोच और घबराहट में आ गए। उन्होंने इसरो प्रमुख प्रोफेसर सतीश धवन से कहा कि उनके पास औपचारिक बैठक में पहनने के लिए न तो सूट है और न ही जूते; उनके पास केवल उनकी साधारण ‘चेर्पू’ (तमिल में चप्पल) ही है। इस पर प्रोफेसर धवन ने मुस्कुराते हुए ऐतिहासिक टिप्पणी की थी “कलाम, तुम पहले से ही सफलता का सूट पहने हुए हो, इसलिए किसी भी हाल में वहां पहुंचो।”
‘कलाम भारतीय पहले हैं‘ वाजपेयी का वह ऐतिहासिक जवाब
उस महत्वपूर्ण बैठक में जब इंदिरा गांधी ने डॉ. कलाम का परिचय संसद में विपक्ष के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी से कराया, तो वाजपेयी जी ने औपचारिक रूप से हाथ मिलाने के बजाय डॉ. कलाम को सीधे अपने गले से लगा लिया। यह देखकर इंदिरा गांधी ने चुटकी लेते हुए कहा, “अटलजी, लेकिन कलाम मुसलमान हैं।” इस पर अटल बिहारी वाजपेयी ने बिना एक पल गंवाए गरिमामयी उत्तर दिया “जी हां, लेकिन वे भारतीय पहले हैं और एक महान वैज्ञानिक हैं।” इस संक्षिप्त संवाद ने दोनों के बीच जीवनभर चलने वाले गहरे विश्वास और आत्मीयता की नींव रख दी थी।
मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव और कलाम का विनम्र इनकार
वर्ष 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने डॉ. कलाम की योग्यता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा को देखते हुए उन्हें सीधे अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का औपचारिक न्योता भेजा। वाजपेयी जी का मानना था कि कलाम जैसे योग्य वैज्ञानिक के मंत्रिमंडल में आने से न केवल देश को सशक्त नेतृत्व मिलेगा, बल्कि समाज के हर वर्ग तक सकारात्मक संदेश जाएगा। डॉ. कलाम ने इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर पूरे एक दिन एकांत में विचार किया और अगले दिन वाजपेयी जी से मिलकर अत्यंत विनम्रता के साथ मंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
पद ठुकराने के दो महीने बाद दुनिया ने देखी भारत की परमाणु शक्ति
डॉ. कलाम ने वाजपेयी जी को स्पष्ट किया कि देश का रक्षा शोध और गुप्त परमाणु परीक्षण कार्यक्रम अपने निर्णायक व अंतिम चरण में पहुंच चुका है, और वे प्रयोगशाला व फील्ड में अपनी मौजूदा जिम्मेदारियों को निभाकर राष्ट्र की कहीं बेहतर सेवा कर सकते हैं। इसके ठीक दो महीने बाद, मई 1998 में जब राजस्थान के पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण हुआ, तब पूरे देश और दुनिया को समझ आया कि कलाम ने मंत्री पद क्यों ठुकराया था। बाद में वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान ही डॉ. कलाम को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद ‘राष्ट्रपति’ के रूप में सर्वसम्मति से चुना गया।