हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों के बाद बेदखली की आशंका से सहमे तिब्बती शरणार्थी, प्रदेश सरकार और केंद्र से लगाई गुहार

रमेश कंवर: शिमला

Himachal News: हिमाचल प्रदेश में वन भूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर हाईकोर्ट के कड़े आदेशों के बाद प्रदेश में कई दशकों से रह रहे तिब्बती शरणार्थियों की बस्तियों पर बेदखली की तलवार लटक गई है। इस स्थिति के बीच तिब्बती शरणार्थी समुदाय अपने आशियानों और भविष्य को लेकर गहरे असमंजस व चिंता में है।

गंभीर बनते हालात के बीच सेंट्रल तिब्बतन रिलीफ कमेटी (सीटीआरसी) ने राज्य सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय से तत्काल राहत की गुहार लगाई है। समिति ने मांग की है कि दशकों पूर्व सरकारी सहमति से बसाए गए तिब्बती परिवारों को सामान्य अतिक्रमणकारियों की श्रेणी में न रखा जाए।

 

वन संरक्षण अधिनियम 1980 से पूर्व स्थापित बस्तियों का दिया हवाला

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से वन भूमि निष्क्रमण के निर्देशों के बाद तिब्बती बस्तियों और धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई की आशंका बढ़ गई है। सीटीआरसी ने स्पष्ट किया कि वे अदालती आदेशों का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि ऐतिहासिक व नीतिगत पहलुओं को ध्यान में रखने की मांग कर रहे हैं। समिति के अनुसार प्रदेश में कई बस्तियां वन संरक्षण अधिनियम, 1980 लागू होने से पहले ही बसा दी गई थीं। ऐसे में पुरानी पुनर्वास व्यवस्थाओं के ऐतिहासिक दस्तावेजों का आकलन किए बिना किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

 

मैकलोडगंज से रिवालसर तक असर: 218 परिवारों और 42 ध्यान गुफाओं पर संकट

सीटीआरसी ने अपने प्रतिवेदन में प्रदेश के कांगड़ा, मंडी और कुल्लू-मनाली क्षेत्रों में स्थित तिब्बती बस्तियों के प्रभावित होने की आशंका जताई है। विशेष रूप से धर्मशाला के मैकलोडगंज में स्थित करीब 218 तिब्बती परिवारों और मंडी के रिवालसर में स्थित 42 ध्यान गुफाओं व धार्मिक स्थलों के वजूद पर संकट मंडरा रहा है। समिति का कहना है कि ये स्थान तिब्बती समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन की रीढ़ हैं। अतः किसी भी कार्रवाई से पूर्व राजस्व व पुनर्वास रिकॉर्ड की गहन जांच होना अनिवार्य है।

 

2014 और 2015 की पुनर्वास नीतियों के तहत अलग व्यवस्था बनाने की मांग

तिब्बती शरणार्थियों की मांग के समर्थन में सीटीआरसी ने केंद्र सरकार की ‘तिब्बतन रिहैबिलिटेशन पॉलिसी-2014’ और हिमाचल प्रदेश सरकार की ‘2015 की नीति’ का संदर्भ प्रस्तुत किया है। समिति का तर्क है कि इन नीतियों में व्यवस्थित रूप से बसाए गए शरणार्थियों और अवैध कब्जाधारियों में स्पष्ट अंतर रेखांकित किया गया है। समिति ने आग्रह किया है कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इन नीतियों के प्रावधानों का अध्ययन करें और पुराने पुनर्वास मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें।

 

मुख्य सचिव स्तर की अंतर-विभागीय बैठक बुलाने की अपील

सीटीआरसी ने सरकार से मांग की है कि जब तक इस मामले का नीतिगत समाधान नहीं निकलता, तब तक बस्तियों में जबरन बेदखली या तोड़फोड़ जैसी कार्रवाई पर रोक लगाई जाए। इसके लिए समिति ने प्रदेश के मुख्य सचिव, वन विभाग तथा केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों की एक संयुक्त अंतर-विभागीय बैठक आयोजित करने का प्रस्ताव रखा है, ताकि समन्वय से उचित रास्ता निकाला जा सके।

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