रमेश कंवर: शिमला
Himachal Politics: हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला, जहां से पूरी राज्य सरकार और शासन की नीतियां संचालित होती हैं, वहां जिला परिषद चुनाव में मिली करारी हार ने सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के भीतर गहरा सियासी भूचाल ला दिया है। जिले के 8 विधानसभा क्षेत्रों में से 7 पर कांग्रेस का कब्जा होने और मंत्रिमंडल में भारी-भरकम प्रतिनिधित्व के बावजूद 26 साल बाद जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पदों पर भाजपा का कब्जा होना पार्टी के लिए एक बेहद गंभीर खतरे की घंटी माना जा रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह परिणाम न केवल शिमला जिले में संगठन की अंदरूनी गुटबाजी को उजागर करता है, बल्कि आगामी हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के दृष्टिकोण से भी कांग्रेस आलाकमान के लिए आत्ममंथन करने का एक बड़ा कारण बन गया है।
3 मंत्री और 7 विधायक होने के बावजूद क्यों बिगड़े समीकरण?
शिमला जिला एकमात्र ऐसा जिला है जिसे कांग्रेस सरकार में सबसे ज्यादा तरजीह और प्रशासनिक ताकत दी गई है। जिले से कैबिनेट में लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह (शिमला ग्रामीण), पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह (कुसुम्पटी), रोहित ठाकुर (जुब्बल-कोटखाई) जैसे दिग्गज चेहरे शामिल हैं। इसके अलावा रोहड़ू से विधायक मोहन लाल ब्राक्टा को पूर्व में मुख्य संसदीय सचिव (CPS) बनाया गया है, जबकि रामपुर से वरिष्ठ नेता नंदलाल, ठियोग से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौड़ और शिमला शहरी से हरीश जनार्था जैसे कद्दावर विधायक मौजूद हैं।
कांगड़ा जिले की 15 में से 11 सीटें जीतने पर भी वहां मात्र 2 मंत्री पद दिए गए थे, क्योंकि रणनीति यही थी कि राजधानी से चलने वाली राजनीतिक लहर का असर पूरे प्रदेश पर पड़ेगा। हालांकि, इस भारी-भरकम प्रतिनिधित्व के बावजूद 25 सदस्यीय जिला परिषद में कांग्रेस केवल 7-10 सीटों के आसपास सिमट गई और 4 निर्दलीय सदस्यों को अपने पक्ष में करने में पूरी तरह नाकाम रही।
निर्दलियों का बिखराव और 2027 के ‘मिशन रिपीट‘ पर मंडराते बादल
चुनाव प्रक्रिया के दौरान कांग्रेस समर्थित निर्दलीय प्रत्याशियों का छिटक जाना और 2 सदस्यों का वोट अमान्य होना यह स्पष्ट करता है कि सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच फ्लोर मैनेजमेंट पूरी तरह ध्वस्त था। जब सत्ता के केंद्र शिमला से ही निराशाजनक राजनीतिक संदेश जाएगा, तो निचले हिमाचल और अन्य जिलों में कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना स्वाभाविक है। यदि कांग्रेस पार्टी को वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों में अपनी सत्ता बरकरार रखनी है और ‘मिशन रिपीट’ के सपने को सच करना है, तो उसे अपनी अंदरूनी गुटबाजी, क्षेत्रीय असंतुलन और कैडर कार्यकर्ताओं की अनदेखी पर तुरंत अंकुश लगाना होगा। राजधानी में मिली इस शिकस्त के बाद अब कांग्रेस नेतृत्व के लिए कड़े संगठनात्मक फैसले लेना अत्यंत आवश्यक हो गया है।