तीस का दशक और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन: जब लंदन में बैठे ‘कई हिन्दुस्तान’ के सामने गांधी ने रखा साझा स्वराज का विज़न

1 घंटा पहले
लंदन में 1931 के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन

संकलन: रमेश कंवर

Second Round Table Conference: 1930 का दशक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राजनीतिक इतिहास का सबसे संवेदनशील, जटिल और निर्णायक कालखंड था। एक तरफ सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत ने देश के जनमानस को उद्वेलित कर दिया था, वहीं दूसरी ओर सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जेलों में बंद था। इसी दौर में डॉ. भीमराव आंबेडकर देश के शोषित, वंचित और दलित वर्ग की सबसे प्रखर, तार्किक और प्रभावशाली राष्ट्रीय आवाज बनकर उभरे। भारत के संवैधानिक ढांचे को तय करने के लिए लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) इसी पृष्ठभूमि में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।

 

एक सम्मेलन कक्ष और उसमें बैठे कई हिन्दुस्तान

गांधी-इरविन समझौते के बाद कांग्रेस की ओर से महात्मा गांधी एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन पहुंचे। सम्मेलन कक्ष में जब गांधी दाखिल हुए, तो उनके सामने केवल औपनिवेशिक ब्रिटिश हुकूमत नहीं थी, बल्कि अलग-अलग हितों, चिंताओं और दावों में बंटा पूरा भारत उपस्थित था। वहां मोहम्मद अली जिन्ना और आगा खां मुस्लिम हितों की नुमाइंदगी कर रहे थे; डॉ. बी. आर. आंबेडकर और रेट्टामलाई श्रीनिवासन ‘डिप्रेस्ड क्लासेज’ के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे; एम. आर. जयकर और बी. एस. मूंजे जैसे हिंदू प्रतिनिधि मौजूद थे; तो वहीं सिख, भारतीय ईसाई, महिला प्रतिनिधियों और उदारवादियों के अपने समूह थे। इसके साथ ही बड़ौदा, भोपाल, बीकानेर, कश्मीर, पटियाला, ग्वालियर और रीवा जैसी दर्जनों रियासतों के राजे-महाराजे और दीवान अपने विशेषाधिकारों की पैरवी में डटे थे। रूपक के तौर पर गांधी के सामने एक नहीं, बल्कि परस्पर विरोधी आकांक्षाओं से भरे कई ‘हिन्दुस्तान’ आमने-सामने बैठे थे।

 

कांग्रेस का दावा: यह विशाल मेहनतकश अवाम की आवाज है

30 नवंबर 1931 को दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में गांधी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस किसी खास वर्ग, जाति या धर्म की संस्था नहीं है, बल्कि दशकों के सार्वजनिक सेवा-कार्य के बल पर यह देश की विशाल मेहनतकश जनता का प्रतिनिधित्व करती है। गांधी का मूल तर्क था कि भारत के भविष्य की दिशा लंदन में बैठकर औपनिवेशिक सरकार तय नहीं कर सकती। भारत की नियति का फैसला भारतीय स्वयं, अपनी जमीन पर और आपसी सहमति से करेंगे। उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए आगाह किया कि यदि भारतीय प्रतिनिधि अपने आपसी और सांप्रदायिक मतभेदों का फैसला ब्रिटिश हुकूमत के हाथों में सौंपेंगे, तो यह देश के हितों का सौदा करने जैसा होगा। 1 दिसंबर 1931 को सम्मेलन के समापन पर गांधी ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता केवल कागजी समझौतों का नाम नहीं, बल्कि जनता के आत्मनिर्णय का बुनियादी अधिकार है।

 

गांधी और आंबेडकर का वैचारिक द्वंद्व

सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच गहरे वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आए। दोनों ही महापुरुष भारत के भविष्य को लेकर समान रूप से फिक्रमंद थे, लेकिन दोनों की प्राथमिकताएं भिन्न थीं। गांधी राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक ताने-बाने की अखंडता से अलग नहीं देख रहे थे; उनका मानना था कि समाज को टुकड़ों में बांटने से राष्ट्रीय आंदोलन कमजोर होगा। इसके विपरीत, डॉ. आंबेडकर का स्पष्ट और दृढ़ तर्क था कि स्वतंत्रता से पहले दलितों और वंचितों के राजनीतिक अधिकार और स्वतंत्र प्रतिनिधित्व सुरक्षित होना अनिवार्य है, जिसके लिए उन्होंने पृथक निर्वाचन (Separate Electorate) की मांग रखी।

 

कम्युनल अवॉर्ड, अनशन और पूना पैक्ट का ऐतिहासिक रास्ता

सम्मेलन किसी ठोस नतीजे के बिना खत्म हुआ, जिसके बाद 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने ‘कम्युनल अवॉर्ड’ (सांप्रदायिक पंचाट) की घोषणा कर दी। इसमें डिप्रेस्ड क्लासेज के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रावधान किया गया।

गांधी ने इसे हिंदू समाज में स्थायी राजनीतिक दरार पैदा करने की ब्रिटिश चाल माना और इसके विरोध में 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसके बाद देश के शीर्ष नेताओं की मध्यस्थता और दोनों पक्षों के बीच चले गहन विचार-मंथन के बाद 24 सितंबर 1932 को ऐतिहासिक ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर हुए। इसके तहत पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को समाप्त कर सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की गई।

गोलमेज सम्मेलन से लेकर पूना पैक्ट तक का यह सफर दर्शाता है कि आजादी की लड़ाई केवल गोरों को देश से निकालने भर की नहीं थी। यह एक ऐसे समावेशी गणराज्य को गढ़ने का महामंथन था, जहां विविधता में सामंजस्य हो, वंचितों को गरिमा व बराबरी मिले और स्वराज का अर्थ समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान बने।

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