आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्त होती हिमाचली शादियों की अनूठी परंपराएं, बुजुर्गों की सामूहिक सीख की अनदेखी

रमेश कंवर

Himachal News: देवभूमि हिमाचल प्रदेश की समृद्ध और अनूठी लोक संस्कृति में विवाह केवल दो दिलों का मिलन नहीं, बल्कि पूरे गांव के आपसी भाईचारे और सामूहिकता का सबसे बड़ा उत्सव हुआ करता था। हालांकि, बदलते समय और आधुनिकता की अंधी दौड़ के कारण अब पुरानी हिमाचली विवाह परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। कभी पूरा गांव मिलकर जिस शादी का बोझ हल्के में उठा लेता था, आज वही शादियां महंगे कैटरिंग और टेंट हाउस के कारण परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ बन रही हैं।

पुरानी स्मृतियों को संजोने वाले ग्रामीण बताते हैं कि पहले के समय में विवाह के लिए बर्तन तक बाजार से या टेंट हाउस से किराए पर नहीं लाए जाते थे। बुजुर्गों ने हर घर के सहयोग से एक गांव की ‘कमेटी’ बनाई होती थी, जहां हर महीने बैठक कर पैसे जोड़े जाते थे और उन पैसों से शादी-ब्याह के लिए सामूहिक बर्तन खरीदे जाते थे।

 

घर-घर में रखे जाते थे बर्तन, अपनेपन और हंसी-मजाक के साथ साफ होते थे पतीले

बुजुर्गों की दूरदर्शिता ऐसी थी कि सामूहिक बर्तनों को रखने के लिए किसी अलग गोदाम की जरूरत नहीं पड़ी। हर घर को एक-एक बर्तन की देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। जब भी गांव में किसी के घर बेटी या बेटे की शादी होती, तो कमेटी की सूची के आधार पर घर-घर से बर्तन इकट्ठे किए जाते थे। विवाह संपन्न होने के बाद गांव के युवा और महिलाएं हंसी-मजाक और खट्टी-मीठी बातों के बीच खुद ही बर्तनों को चमकाकर साफ कर दिया करते थे। इसके बदले में उनके लिए विशेष पकवान बनाए जाते थे। जिस परिवार में विवाह होता था, उसे कभी काम के दबाव या संसाधनों की कमी का अहसास ही नहीं होने दिया जाता था।

 

कच्चे चील के चलाफू से स्वागत द्वार और पत्तल पर धाम का वो खास स्वाद

पुराने समय में महंगे टेंट और प्लास्टिक के भव्य द्वारों की जगह कुदरत के बीच से मिले कच्चे चील के पौधों (चलाफू) से पारंपरिक स्वागत द्वार बनाए जाते थे। इसके अलावा, जमीन पर बैठकर पत्तल पर परोसी जाने वाली हिमाचली ‘धाम’ का स्वाद ही अलहदा होता था। ‘तेलिया माहं दा स्वाद, काले चने दा चटपटा खट्टा और मिठा बत्त (चावल)’ की महक पूरे माहौल को खुशनुमा बना देती थी। बारात के स्वागत में चाय की बड़ी चरोटी चढ़ाई जाती थी और दोने (दुनु) में बूंदी-सेवियां बांटी जाती थीं। आज की महंगी और भव्य शादियों में भी वह सादगी भरा स्वाद और अपनत्व गायब हो चुका है।

 

बुजुर्गों की बचत और सामूहिकता का संदेश नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज के दौर में भले ही टेंट हाउस, डीजे और कैटरिंग सर्विस ने जगह ले ली है, लेकिन हिमाचल के कई सुदूर ग्रामीण इलाकों में आज भी बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई इन परंपराओं को जिंदा रखा गया है। यह पारंपरिक ढांचा केवल पैसों की बचत का साधन नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को एक साथ मिलकर रहने, एक-दूसरे के सुख-दुख में काम आने और सीमित संसाधनों में भी खुशियां ढूंढने की सीख देता था। आज की युवा पीढ़ी को यह समझाने की सख्त जरूरत है कि कैसे हमारे पूर्वज कम पैसों में भी आपसी सहयोग से ऐतिहासिक शादियां रचाया करते थे।

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